08 अक्तूबर 2017

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

अरुण साथी

ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। वह एक हिंदू होकर ताजिया को कांधा दे रहा है इस बात से उसे कोई लेना-देना नहीं है। उसका धर्म बस दो पैसा कमा लेना है जिससे उसके बाल-बच्चे को रोटी मिल सके। उसके साथ दो दर्जन मांझी युवक यही कर रहे थे। यही युवक देवी दुर्गा की भारी-भरकम प्रतिमा को भी कंधे पर उठाकर रात-रात भर जागकर नगर में घुमाते रहें है। आज जब हम धर्म के नाम पर मार-कुटाई कर रहे हैं और नफरत की इतनी बड़ी खाई बना दी गई है कि कोई गांधी भी आकर उसे अब पाट नहीं सकता तब बबलू मांझी जैसे युवकों से ही हमें सीख लेनी चाहिए, उसका धर्म उसकी रोटी है। रोजगार है। भूख है। विकास है।

कितनी नफरत है चारो तरफ

बात अगर धार्मिक नफरत की करें तो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक बड़ी सी दीवार नजर आती है। यह आग नेताओं द्वारा हमेशा से लगाई जाती रही है पर अब इस आग में घी का काम सोशल मीडिया कर रही है। साथ साथ चौथाखंभा भी यही कर रही। अब चैनल छाती ठोक से पार्टी के समर्थक होने का दावा कर रहे। हमारी राजनीतिक आस्था का पता भी अब इससे चलता है कि हम #ज़ी_न्यूज़ देखते है की #एनडीटीवी! कट्टरपंथी हिंदू से अगर बात करें तो उनके लिए मुसलमानों का बच्चा बच्चा आतंकवादी है! मदरसों में पढ़ाई जाने वाली धार्मिक कट्टरता आतंकवादी पैदा कर रहे हैं! उनका तर्क होता है कि दुनिया भर में आतंक फैलाने वाला हर एक आदमी मुसलमान क्यों है! मुसलमान भारत को अपना देश नहीं मानते! वे दुश्मन देश पाकिस्तान को अपना मानते है!

उधर मुसलमानों से अगर बात की जाए तो उनके लिए देश से बड़ा धर्म है! इंसानियत से बड़ा शरीयत है! वे कहते हैं कि बंदेमातरम् क्यों कहूं? वे कहते हैं कि दुर्भाग्य से नरेंद्र मोदी देश का प्रधानमंत्री है? आज भी वह इसे स्वीकार नहीं कर रहे! तीन तलाक, बाल काटने पे फतवा जैसे मशलों पे तथाकथित क्रांतिकारी, उदारवादी लोग भी चुप्पी साध लेते है। और गौ रक्षक, लव जेहाद, असहिष्णुता, लिनचिंग जैसे मुद्दे पे उनकी उदारता प्रखर हो उठती है!

आग ही आग
बिहार में दुर्गा पूजा और मोहर्रम में मचा हंगामा अभी नहीं थमा है। नवादा में हंगामा इस लिए मच गया कि कुछ युवक नारा लगा रहे थे "भारत में रहना है तो वन्दे मातरम कहना होगा।" और फिर ताजिया जुलूस में कहीं पाकिस्तानी झंडे और टी शर्ट पहन कर निकले तो कहीं पाकिस्तान जिन्दावाद का नारा लगाया! क्रिकेट मैच हो या अन्य मुद्दे पाक का समर्थन करते है...

दूसरी तरफ गौ रक्षा के नाम पे लंपट गैंग आदमी की सरेआम हत्या कर रहे हैं जबकि वही गैंग तब चुप रहता है जब बूढ़ी, बीमार गाय हो हिन्दू ही कसाई के हाथों बेच देता है। पशु बाजार जाकर देखिये तब समझ आएगा की हिन्दू का गौ प्रेम कितना है!
हद तो यह कि ये गैंग तब भी चुप रहता है जब गौशाला में 700 से अधिक गाय खाना के अभाव में मर जाती है। तब चुप रहता है जब उनकी प्यारी सरकार गौशाला के लिए कुछ नहीं करते..!

गांधी का अपमान
व्हाट्सएप ग्रुप में यदि देखें तो हिन्दू शब्द वाले ग्रुप में ऐसे ऐसे अफवाह रहेंगे की लगेगा देश नहीं बचेगा। अभी हाल भी में एक मित्र के ग्रुप को देख रहा था। गांधी जयंती पे गांधी जी को इतनी गालियां दी गयी कि कहा नहीं जा सकता और ग्रुप में किसी ने विरोध नहीं किया। इसी तरह मुसलमानों के ग्रुप में भी नरेंद्र मोदी को लेकर देखा जा सकता है!

वोट बैंक में बदल जाना

नफरत की राजनीति करने वालों के लिए यह सुखद समय है। आज जनहित की राजनीति करने वाले विलुप्त हो गए है और जहर उगलने वालों का जयकार है। निश्चित रूप से इससे कभी देश का भला नहीं हो सकता। आज मुसलमानों के आर्थिक पिछड़ापन, गरीबी को देखें तो यह बात समझ मे आ जायेगी की मुसलमानों के हितैषी पार्टियों ने उनके लिए क्या किया? बस एक वोट बैंक बन कर रह गए। हद तो यह कि यह बात मुसलमानों को आज तक समझ नहीं आयी। आश्चर्य है कि मुस्लिम हितैषी पार्टियों ने हलखोर जैसे गरीब मुसलमानों को दलित का दर्जा नहीं दिया, बस नारा दिया।

आज वही स्थिति हिंदुओं की है। हिन्दू आज वोट बैंक में बदल गए हैं। वे कहते है रोटी, रोजगार, विकास, अपराध, अपमान, बेटी सुरक्षा की बातें मत करो, धर्म की बातें करो। वही हम कर रहे। एक स्वास्थ्य समाज, संस्कृति और प्रगतिशील लोकतंत्र के लिए धर्म और जाति का वोट बैंक में बदल जाना उतना ही खतरनाक है जितना जहर पीना..! तुष्टीकरण ने न मुसलमानों का भला किया न हिन्दुओं का करेगा..बस..बहुत लंबा हो गया..

02 अक्तूबर 2017

*अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस*

*अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस*

साहब बहुत गरम है, कह रहे हैं कि गंधी जी को मार तो दिया पर वह मर काहे नहीं रहिस है। अगल-बगल में चेले चपाटी भी थे। वे लोग भी साहिब के गुस्से को देखकर मुंह लटका लिए। जयंती के दिन वैसे भी मुंह लटका ही लेना चाहिए। चेले चपाटी को यही लगा। पर साहेब का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा। तभी उधर से हमारे मघ्घड़ चा भी आ पहुंचे।

"का कहते हो मर्दे। हेतना उपाध्याय, मुखर्जी सबको लगा दियो तब भी गंधी महत्मा नहीं मर रहिस...घोर कलयुग..काहे नहीं, हे राम-काम तमाम वाले दिन को अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस धोषित कर देते हो। एकरा में मसूदी, बगदीदी जैसे क्रांतिकारी का भी समर्थन मिल ही जायेगा....ठोका-ठाकी पार्टी वाला सब साथ आ ही जायेगा..।"


चा का ई सुझाव साहिब को जांच गया। तब से अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस की घोषणा हो गयी। मघ्घड़ चा सुनहरे सपनों में खोकर योजना बना लिए। उस दिन सोशल मीडिया पे सेकुलर कुत्ते जैसे अनमोल प्रवचन की भरमार रहेगी...

मजाल है कि चूं कर ले..ऐसा ऐसा बीएचयू और जेएनयू टाइप फार्मूला निकालेंगे की सेकेंड नहीं लगेगा देशद्रोही साबित करे में..वैसे भी इतने सालों तक ई खांग्रेसी देशद्रोही, भ्रष्टाचारी ही शासन करते रहे है. ई वामी कीड़े तो रजिस्टर्ड देशद्रोही है..गरीब के नाम पे लूट करे वाला...

तभी जुम्मन आ कर पूछने लगा "साहिब हुजूर। गोबर बहुते जमा हो गया है। उसको दीवार पे थापे की नहीं। का आदेश है। कहीं रक्षक जी महाराज आकर मार कुटाई न कर दें...."

जे हिन... जे भारत...

29 सितंबर 2017

धर्म के नाम पे जीव हत्या कैसे उचित?

धर्म के नाम पे जीव हत्या कैसे उचित?

ईश्वर के नाम पर उनकी ही संतानों को मार देना कहीं से भी ईश्वर को प्रसन्न करने की बात नहीं हो सकती। एक तरफ हमारे सभी धर्म ग्रंथ कहते हैं कि सारे जीव जंतु ईश्वर की संतान हैं तो फिर कैसे अपने ही संतान की बलि लेकर कोई प्रसन्न हो सकता है! हालांकि धर्मों के आधार पर हमारी सोच और मान्यताएं बदल जाती है। कुछ दिन पहले कुर्बानी पर पशु प्रेम हमारा जागृत हो गया था, परंतु आज वही सन्नाटा है।

हालांकि स्थिति बहुत ही नकारात्मक नहीं है। जैसे जैसे हम जागरुक हो रहे हैं बलि प्रथा का विरोध कर रहे हैं। कई गांवों में बलि के रूप में भुआ नामक फल को काटा जाता है जो कि एक सकारात्मक पहल है। सभी जागरुक लोगों को इसके लिए आगे आना चाहिए। हमारे विद्वान धर्माचार्य अपने किसी भी ग्रंथ में बलि प्रथा का समर्थन नहीं होने की बात कही है। धर्म को इस तरह से विकृत कर हम खुद ही आधार्मिक हो जाते हैं। आइए बलि प्रथा का विरोध करें। इसे मांसाहार से न जोड़े, यह एक अलग विषय है।।

22 सितंबर 2017

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे
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एक महीने के भीतर फिर एक पत्रकार मारा गया है. इस बार बुरी खबर आई है त्रिपुरा के कम्युनिस्ट राज से. त्रिपुरा के लोकल चैनल 'दिनरात' मे काम करने वाले शांतनु भौमिक पर चाकू से हमला हुआ. उन्हें अगरतला अस्पताल ले जाया गया. जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
पुलिस के मुताबिक शांतनु पश्चिमी त्रिपुरा में इंडिजीनस फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और सीपीएम के ट्राइबल विंग टीआरयूजीपी के बीच संघर्ष को कवर कर रहे थे. उसी दौरान उनका अपहरण कर लिया गया था. महज 24 साल के इस युवा पत्रकार को चाकुओं से गोदकर और पीटकर मार डाया गया. जिस राज्य में मारा गया, वो सीपीएम शासित है. माणिक सरकार मुख्यमंत्री हैं.
हाल के दिनों में पत्रकारों पर हमले की कई घटनाएं हुई हैं. ताजा मामला बेंगुलुरु में गौरी लंकेश की हत्या का था. अब उसी कड़ी में त्रिपुरा से एक नाम और जुड़ गया है. इसी बहाने गौरी लंकेश की मौत पर जश्न मनाने वाले ट्रोल टाइप लोगों को भी मौक़ा मिल गया है
लंकेश की हत्या के विरोध में लामबंद होने वाले वामपंथी नेताओं और वामपंथी विचारधारा वाले पत्रकारों-लेखकों से लेकर उन तमाम पत्रकारों या अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधरों से सोशल मीडिया पर सवाल पूछे जाने लगे हैं कि गौरी लंकेश पर बोले तो अब क्यों नहीं बोल रहे हो? गौरी लंकेश की हत्या पर प्रेस क्लब में जमा हुए तो अब क्यों नहीं हो रहे हो? गौरी लंकेश की हत्या पर बेंगलुरु में प्रर्दशन कर रहे थे तो अब अगरतला में क्यों नहीं कर रहे हो ...? गौरी लंकेश के खिलाफ जुटी आवाजें अब कहां गुम हैं ?
बहुत हद तक ये सवाल जायज भी हैं. ऐसे सवाल पूछे भी जाने चाहिए कि गौरी की हत्या पर उतना हंगामा तो शांतनु की हत्या पर इतना सन्नाटा क्यों? प्रेस क्लब ऑफ इंडिया या बाकी संगठन को इस हत्या के खिलाफ कड़े स्वर में विरोध दर्ज करना चाहिए. मान कर चल रहा हूं कि कराएंगे भी. सवाल तो ये भी है कि सोशल मीडिया के सिपाहियों और कर्मठ कार्यकर्ताओं को इतनी जल्दबाजी क्यों हो गई? शांतनु भौमिक की हत्या के विरोध के बहाने गौरी लंकेश की हत्या के बाद एकजुट होने वालों को घेरने की मुहिम क्यों चल पड़ी? इनका गुस्सा शांतनु की हत्या के खिलाफ है या गौरी लंकेश के पक्षधरों के खिलाफ? इन सवालों के जवाब में ही बहुत कुछ छिपा है.
बात सवाल पूछने वालों पर भी होनी चाहिए और मौन साधने वालों पर भी. दोनों सेलेक्टिव हैं. दोनों अपनी धारा के माकूल विषय देखकर ही बोलते और मौन साधते हैं. जो मौन साधता है, उसे दूसरा आकर कोंचता है कि तुम चुप क्यों हो? बोलते क्यों नहीं? और जो बोलता है, उसे भी पहला आकर पूछता है कि तब तुम कहां थे...तब तुम चुप क्यों थे? दोनों 'तब तुम कहां थे' के सिंड्रोम से ग्रसित हैं .
खास बात ये है कि त्रिपुरा के पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या पर खुद शोक संतप्त होकर गौरी लंकेश की हत्या पर शोक मनाने वालों को घेरने वालों में वो लोग भी हैं, जो गौरी लंकेश को गोलियों से छलनी किए जाने के चंद घंटों के भीतर उन्हें पूतना, कुतिया, रावण की बहन-बेटी घोषित करके जश्न मना रहे थे. गौरी की हत्या को पूतना वध कह रहे थे. गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें डायन, चुड़ैल, संपोली...न जाने क्या-क्या कहा गया.
उनके पुराने लेखों और विचारों को सोशल मीडिया पर शेयर करके उनकी हत्या को सही साबित करने की कोशिश खुलेआम की गई. कई दिनों तक सोशल मीडिया पर गौरी की हत्या के खिलाफ बोलने वाले को हर तरह से घेरा गया. ऐसा माहौल बना दिया गया कि गौरी का मारा जाना किसी भी तरह से गुनाह नहीं. बल्कि गुनाह वो कर रही थीं, जिसकी किसी ने उन्हें सजा दे भी दी तो हाय तौबा नहीं मचनी चाहिए.
त्रिपुरा में पत्रकार शांतनु की हत्या की निंदा भी होनी चाहिए और त्रिपुरा सरकार की लानत-मलामत भी. गौरी लंकेश की हत्या पर एकजुट हुए वामपंथी नेताओं को भी जवाब देना चाहिए कि जब उनके सूबे में पत्रकार सुरक्षित नहीं तो वो किस मुंह से गौरी लंकेश की हत्या पर मातम मनाने के जुलूस में शामिल हुए थे? अगर तब चीख रहे थे तो अब भी चीखिए और कहिए कि आपके राज ये कैसे हुआ? पत्रकारों की सुरक्षा में अपनी सरकार और तंत्र की नाकामी का जवाब दीजिए.हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचाकर कबूल करिए कि ये आपकी नाकामी थी.
यकीनन वामपंथी जमात को भी त्रिपुरा के इस पत्रकार के कत्ल की निंदा भी उसी तेवर के साथ करनी चाहिए. प्रेस क्लब में पत्रकारों की सभा में मंचासीन वामपंथी नेताओं ने तब गौरी लंकेश की हत्या पर जितनी चिंता जताई थी, वो सारी चिंताएं तभी मायने रखेंगी, जब कन्हैया कुमार से लेकर डी राजा, सीताराम येचुरी उसी अंदाज में, उसी तेवर के साथ वामपंथ शासित सूबे में एक पत्रकार की हत्या पर चिंता जताएं. विरोध दर्ज कराएं.
किसी भी पत्रकार या लेखक की हत्या को सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी/प्रेस की आजादी पर हमला मान कर मैं नहीं देखता. मेरा मानना है कि विचार का मुकाबला विचार से हो, चाकू और गोलियों से नहीं. तब तक जब तक वो विचार या विचारधारा वाला व्यक्ति देश/समाज के लिए बड़ा खतरा न बन जाए. अगर कोई ऐसा खतरा बनता है तो उसे रास्ते पर लाने /सबक सिखाने/सलाखों के भेजने /कानून की गिरफ्त में पहुंचाने के कई तरीके हैं. जो सभ्य समाज के तरीके हैं. किसी भी सूरत में गौरी की हत्या को जस्टीफाई नहीं किया जा सकता और जो जस्टीफाई करते रहे हैं वो शांतनु भौमिक की हत्या के विरोध का मुखौटा लगाकर घेराबंदी का माहौल बना रहे हैं.
गौरी की हत्या के पीछे कौन लोग थे ? क्या उनके लेखन की वजह से उन्हें मारा गया ? क्या उनकी विचारधारा से चिढ़े किसी कट्टरपंथी ने उनकी हत्या कर दी ? इसका खुलासा होना अभी बाकी है. हो सकता है कि इसमें लंबा वक्त लगे. हो सकता है कि गौरी लंकेश के हत्यारे पकड़े भी न जाएं. जैसे कलबुर्गी और पनसारे की हत्या के बहुत से तार आज तक नहीं जुड़ पाए. गौरी की हत्या के बाद कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता गौरी लंकेश को बचा न पाने वाली अपनी सरकार पर शर्मिंदा होने की बजाय पीएम मोदी को घेरने में जुट गए. उनका हित इसी में सधता दिखा.
अगर गौरी लंकेश पर कोई खतरा था तो उनकी हिफाजत की जिम्मेदारी कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की थी. तो प्रेस क्लब में गौरी लंकेश की हत्या पर बुलाई गई पत्रकारों की सभा में कांग्रेस नेता शोभा ओझा के आने या बुलाने का कोई औचित्य नहीं था. अगर वो बिन बुलाए आ भी गईं तो उन्हें माइक थाम कर गौरी की हत्या शोक व्यक्त करने से पहले अपनी शर्मिंदगी और नाकामी का इजहार करते हुए कबूल करना चाहिए था कि गौरी को न बचा पाने के लिए उनकी सरकार ज़िम्मेदार है
वामपंथी नेता भी खूब बोले. तब उन्हें बोलना मुफीद लग रहा था. अब वो बोलने से पहले सोच रहे होंगे. जो तब या तो चुप थे या गौरी के लेखकीय गुनाह पर रिसर्च करके चाहे-अनचाहे उनकी हत्या को सही ठहरा रहे थे, वो अब बुरी तरह से सक्रिय हैं. जैसे इस बार उनकी बारी हो.
इन सबके के बीच बड़ा सवाल है पत्रकारों की सुरक्षा का. देश के हर हिस्से में पत्रकारों पर हमले होते रहे हैं. सीवान में राजदेव रंजन से लेकर यूपी के शाहजहांपुर तक से ऐसी खबरें सुर्खियां तो बनीं लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा के मुद्दे पर सरकारों की तरफ से कोई पहल नहीं होती दिख रही है. जरूरत इस बात की है. असल मुद्दा ये है. पत्रकार चाहे बेंगलुरु की गौरी लंकेश हों या त्रिपुरा का शांतनु भौमिक. विरोध और एकजुटता दोनों के पक्ष में हो, इसमें कोई शक नहीं.
जिन-जिन पत्रकारों ने गौरी की हत्या के विरोध में कुछ लिखा या सोशल मीडिया में इस जघन्य हत्या के खिलाफ आवाज उठाई, उन्हें शांतनु की हत्या के बहाने ट्रोल किया जा रहा है. प्रेस्टीच्यूट /दलाल / बिकाऊ और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है. कोई शक नहीं कि ऐसा बहुत बड़ा तबका है इस देश में, जिसके हर विरोध और विमर्श की बुनियाद मोदी विरोध पर टिकी है.
सही या गलत, मायने नहीं रखता. इसका मतलब ये नहीं कि आलोचना की हर आवाज बिकी हुई है. असहमति की हर आवाज को प्रेस्टीच्यूट कह दिया जाए. हम गौरी लंकेश की मौत पर मातम मना रहे थे. शांतनु की मौत पर भी मातम मनाएंगे. कितना मनाएं. कब मनाएं. कहां मनाएं. ये पैमाना तय करने का हक उन्हें नहीं, जो किसी की हत्या को भी सही ठहराने की दलीलें देते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम के फेसबुक से साभार 

16 सितंबर 2017

अथ श्री एक्सप्रेस ट्रेन शौचालय कथा भाया बुलेट ट्रेन

अथ श्री एक्सप्रेस ट्रेन शौचालय कथा भाया बुलेट ट्रेन

अरुण साथी
पटना से सूरत, दिल्ली, पंजाब , मुंबई एक्सप्रेस का स्लीपर डिब्बा खचाखच भरा हुआ। एक दूसरे से देह रगड़ा रहा है। दरबाजे पे भी हेंडल पकड़ कई लटके हुए है। बगल में पोस्टर सटा हुआ है। लटकला बेटा त गेला बेटा! वहीं किसी ने लिख दिया पूरा देश आज लटका हुआ है। देख लीजिए फेसबुक, ट्वीटर!!

उसी में किसी तरह मघ्घड़ चा भी लोड हो गए। उनका झोला तो बाहर ही रह गया। गनीमत की पॉकेट में टिकट रख लिए थे। अंदर देह से देह रगड़ खा रहा है। एक सूत जगह खाली नहीं। खैर बेटा सीरियस है एम्स में। कहीं और इलाज ही नहीं हो सका। जाना तो होगा ही।

छुकछुक छुकछुक, छुकछुक छुकछुक रेलगाड़ी चलती जा रही थी। तभी काला कोट धारी मोटूमल टीटी दो तीन मुस्टंडे के साथ सबको गाली-गलौज करते डब्बे में गांधी जी समेटने में लग गया। ज्यादा लोग मजदूर। टिकट रहते हुए भी हड़का देते। बक्सा ले जाना मना है! गोदी के बच्चे का टिकट क्यों नहीं! खैर मघ्घड़ चा से भी यही पैतरा आजमाया। मघ्घड़ चा तो अपने खेलल खिलाड़ी है। रिजर्वेशन में वेटिंग का टिकट दिखा दिए। "एक अधेली धूस नै देबो टीटी बाबू, जादे करभो त दिल्ली जा रहलियो हें, मोदिया से कम्पलेन करबो जाके। की नाम हो तोर। टीटी बढ़ गया। कहाँ मगजमारी करें। इतना में कई मुर्गा धरा जाएगा।

"ये हटो हटो, तनी जाने दो। लघुशंका जाना हे हो। पटने के लगल हे बक्सर पहुंच गेल। चिनिया के मरीज हूँ मर्दे।"
मघ्घड़ चा को जोर से लगी थी। किसी तरह ठेल-धकेल के शौचालय तक पहुंच गए। नजारा देखा तो झांय आ गया। शौचालय का दरवाजा खुला है। चार-पांच आदमी उसमें जमे हुए है। अब का करें भाय। मघ्घड़ चा गरम हो गए।
"का हाल कर दिहिस है। जरियो लाज बिज नै हो। कैशन रेलगाड़ी हो। हग्गे-मुत्ते पर भी आफत!"
"का करियेगा चाचाजी। पेट मे जब आग लगो हई त गू-मूत नै दिखो हई!" एक नौजवान ने तंज कसा।"

तभी उसी शौचालय में लफुआ मोबाइल (स्मार्ट मोबाइल) हाथ मे लिए एक युवक जोड़ से चिल्लाया।
"बधाई हो। मोदीजी ने बुलेट ट्रेन का शिलान्यास कर दिया। इसे कहते है। अच्छे दिन।" ट्रेन में सन्नटा छा गया। मघ्घड़ चा का प्रेशर जोर मार रहा था। समझ नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया दें। गांव के चौखंडी पे लोग उनको भगत जी कहके चिढ़ाते है। अभी हाल में रेल हादसों पे लंबी बहस चली। संसद में क्या वैसा चलेगा। स्कुलिया बच्चा सब रुक के सुनता था। दो-चार जो विरोधी था उसको चुप्प करा देते।
"सत्तर साल के कोढ़ एक दिन में ठीक होतै!अकेले मोदिया की करतै, हमरो, तोरा सुधरे के चाही।"

तभी उनको लगा कि उनकी घोती गीली हो रही है। प्रेसर हाई। उनके आंखों के आगे तारे चमकने लगे! और हाय मोदिया कहते हुए मघ्घड़ चा बेहोश हो गए...!

बस इतना ही दुआ कीजिये
कि बाकि सब  ठीक हो,
किसी तरह से अच्छे दिन
सबको नसीब हो!!

बुलेट ट्रेन चले,
बस गाय-गुरू जैसा
आम आदमी ने मरे
सबके लिए नीति बने
अमीर हो, गरीब हो!!

07 सितंबर 2017

लंकेश के हत्यारे का अट्टहास...

हत्यारे अट्टहास कर रहे हैं...

गौरी लंकेश को किसने मारा, क्यों मारा, इन वजहों की तलाश अभी बाकी है परंतु राजनीतिक पूर्वाग्रहों की वजह से जिस तरह एक पक्ष किसी को आरोपित कर रहा है सबसे पहले मैं उसकी निंदा करता हूं परंतु दूसरा पक्ष जिस तरह से सोशल मीडिया पर गौरी लंकेश की खिल्ली उड़ा रहा, उनकी हत्या पर अट्टहास कर रहा, जश्न मना रहा और गंदी गंदी गालियों से उनको नवाज रहा इतना ही नहीं उनकी तरह समान विचारधारा वाले को भी गालियां दी जा रही यह अपने आप में इस बात को साबित करता है कि गौरीशंकर लंकेश को किसने मारा! मारने वाला हत्यारा भले ही  किसी व्यक्तिगत कारण से उनकी हत्या की हो परंतु सोशल मीडिया के कट्टरपंथी धुरंधर उनकी हत्या लगातार कर रहा है। कई बार उनको मार रहा है।

विचारों से सहमति-असहमति ही लोकतंत्र की खूबसूरती है। परंतु एक बहुत बड़ा वर्ग यदि किसी की हत्या को उचित ठहराने लगे तो मेरी समझ से आईएस और तालिबान सरीखे आतंकवादी और उनके समर्थकों से अलग इनकी सोच नहीं है। स्वागत है तालिबानीकरण का!

सावधान! मैंने पहले ही कहा की हत्या के बाद किसी को भी आरोपित करना निंदनीय है! एक पक्ष जिस तरह रोहित वेमुला प्रकरण या दादरी प्रकरण पर हो हल्ला मचाया और दिल्ली के डॉक्टर नारंग सरीखे प्रकरण पर ओम शांति रखा, यह भी एक वजह मुझे दिखती है कि देश में कट्टरपंथी विचारधारा को हम हवा दे रहे हैं! धर्मनिरपेक्षता कि खुद से गढ़ ली गयी वर्तमान परिभाषा को हमें फिर से परिभाषित करने की जरूरत है नहीं तो इस देश को जिस दिशा में ले जाया जा रहा उसके कलंक का टीका आपके माथे पे भी होगा..

06 सितंबर 2017

हत्यारा कौन...?

हत्यारा कौन?

सवाल यह नहीं है
कि किसने मारा

सवाल तो यह भी नहीं है
कि किसको मारा

सवाल तो यह भी नहीं है
कि किससे मारा

सवाल यह है
कि क्यों मारा..

उससे भी बड़ा सवाल
यह है कि
जब हत्यारा
हो कोई विचारधारा
तब हम
वामपंथी
दक्षिणपंथी
मध्यमार्गी
समाजवादी
पूंजीवादी
हिन्दू
मुस्लिम
ईसाई
में उलझकर
हत्यारे को माफ कर देत हैं..
06/09/17

31 अगस्त 2017

अच्छे लोगों को राजनीति में होना चाहिए..#ओशो

15 अगस्त को भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली लेकिन क्या स्वतंत्र भारत को स्वस्थ राजनीति नसीब हुई? पढ़ें ओशो की अंतर्दृष्टि की राजनीति के विषय में।

अच्छे लोगों के हाथों में राजनीति आ जाए तो अभूतपूर्व परिवर्तन हो सकते हैं। क्यों? कुछ थोड़ी-सी बातें हम खयाल में ले लें। बुरा आदमी बुरा सिर्फ इसलिए है कि अपने स्वार्थ के अतिरिक्त वह कुछ भी नहीं सोचता। अच्छा आदमी इसलिए अच्छा है कि अपने स्वार्थ से दूसरे के स्वार्थ को प्राथमिकता देता है। तो बड़ा फर्क पड़ेगा। अभी 'राजनीति' व्यक्तियों का निहित स्वार्थ बन गई है, तब राजनीति समाज का स्वार्थ बन सकती है- एक बात।

बुरा आदमी सत्ता में जाने के लिए सब बुरे साधनों का उपयोग करता है और एक बार सत्ता में जाने में, अगर बुरे साधनों का उपयोग शुरू हो जाए तो जीवन की सब दिशाओं में बुरे साधन प्रयुक्त हो जाते हैं। जब एक राजनीतिज्ञ बुरे साधन का प्रयोग करके मंत्री हो जाए, तो एक गरीब आदमी बुरे साधनों का उपयोग करके अमीर क्यों न हो जाए? और एक शिक्षक बुरे साधनों का उपयोग करके वाइस-चांसलर क्यों न हो जाए? और एक दुकानदार बुरे साधनों को उपयोग करके करोड़पति क्यों न हो जाए? क्या बाधा है?

'राजनीति' थर्मामीटर है पूरी जिंदगी का। वहाँ जो होता है, वह सब तरफ जिंदगी में होना शुरू हो जाता है। तो राजनीति में बुरा आदमी अगर है तो जीवन के सभी क्षेत्रों में बुरा आदमी सफल होने लगेगा और अच्छा आदमी हारने लगेगा। और बड़े से बड़ा दुर्भाग्य हो सकता है किसी देश का, कि वहाँ बुरा होना असफलता लाता हो, भला होना असफलता ले आता हो।

आज इस देश में भला होना असफलता की पक्की 'गारंटी' है। किसी को असफल होना हो, तो भले होने से अच्छा 'गोल्डन रूल' नहीं है। बस भला हो जाए, असफल हो जाएगा। और जब भला होना असफलता बन जाए, और बुरा होना सफलता की सीढ़ियाँ बनने लगे, तो जिंदगी सब तरफ विकृत और कुरूप हो जाए, तो आश्चर्य क्या है!

राजनीति जितनी स्वस्थ हो, जीवन के सारे पहलू उतने ही स्वस्थ हो सकते हैं। क्योंकि राजनीति के पास सबसे बड़ी ताकत है। ताकत अशुभ हो जाए तो फिर कमजोरों को अशुभ होने से नहीं रोका जा सकता है। मैं मानता हूँ कि राजनीति में जो अशुद्धता है, उसने जीवन के सब पहलुओं को अशुद्ध किया है।

सत्ता जिसके पास है, वह दिखाई पड़ता है पूरे मुल्क को, और जाने-अनजाने हम उसकी नकल करना शुरू कर देते हैं। सत्ता की नकल होती है, क्योंकि लगता है कि सत्ता वाला आदमी ठीक होगा। अंग्रेज हिंदुस्तान में सत्ता में थे, तो हमने उनके कपड़े पहनने शुरू किए। वह सत्ता की नकल थी। वे कपड़े भी गौरवपूर्ण, प्रतिष्ठापूर्ण मालूम पड़े।

अगर अंग्रेज सत्ता में न होते और चीनी सत्ता में होते तो मैं कल्पना नहीं कर सकता कि हमने चीनियों की नकल न की होती। हमने चीनियों के कपड़े पहने होते। सत्ता में अंग्रेज था, तो उसकी भाषा हमें ज्यादा गौरवपूर्ण मालूम होने लगी। सत्ता के साथ सब चीजें नकल होनी शुरू हो जाती हैं। सत्ताधिकारी जो करता है, वह सारा मुल्क करने लगता है।

जब एक बार अनुयायी को यह पता चल जाए, कि सब नेता बेईमान हैं, तो अनुयायी को कितनी देर तक ईमानदार रखा जा सकता है। नहीं, अच्छे आदमी के आने से आमूल परिवर्तन हो जाएँगे।

अच्छा आदमी कुर्सी को पकड़ता नहीं : फिर अच्छे आदमी की बड़ी से बड़ी जो खूबी है, वह यह है कि वह कुर्सी को पकड़ नहीं लेगा, क्योंकि अच्छा आदमी कुर्सी की वजह से ऊँचा नहीं हो गया है। ऊँचा होने की वजह से कुर्सी पर बिठाया गया है। इस फर्क को हमें समझ लेना चाहिए। बुरा आदमी कुर्सी पर बैठने से ऊँचा हो गया है, वह कुर्सी छोड़ेगा, फिर नीचा हो जाएगा। तो बुरा आदमी कुर्सी नहीं छोड़ना चाहता है।

अच्छा आदमी, अच्छा होने की वजह से कुर्सी पर बिठाया गया है। कुर्सी छोड़ने से नीचा नहीं हो जाने वाला है। अच्छा आदमी कुर्सी को छोड़ने की हिम्मत रखता है। और जो लोग कुर्सी को छोड़ने की हिम्मत रखते हैं, किसी भी चीज को चुपचाप छोड़ सकते हैं, बिना किसी जबर्दस्ती किए उनके साथ, वह मुल्क की जीवनधारा का अवरोध नहीं बनते।

लेकिन बुरा आदमी पकड़ लेता है, छोड़ता नहीं है। अच्छा आदमी जब भी पाएगा कि मुझसे बेहतर आदमी काम करने आ रहा है, तो वह कहता है, अब आ जाओ, मैं हट जाता हूँ। अच्छे आदमी की हटने की हिम्मत, बड़ी कीमत की चीज है। बुरे आदमी की हटने की हिम्मत ही नहीं होती है। वह जोर से पकड़ लेता है। एक ही रास्ते से हटता है वह। उसको या तो बड़ी कुर्सी दो, तो वह हट सकता है, नहीं तो नहीं हट सकता, और या फिर मौत आ जाए, तो मजबूरी में हटता है।
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अच्छा आदमी सत्ता में होगा तो अच्छे आदमी को पैदा करने की व्यवस्था करता है। क्योंकि बुरा आदमी जो प्रतिक्रिया पैदा करता है, उससे और बुरे आदमी पैदा होते हैं। और यह भी ध्यान रहे कि बुरा आदमी जब चलन में हो जाता है तो अच्छे आदमी को चलन से बाहर करता। खोटे सिक्के की तरह।


अगर खोटा सिक्का बाजार में आए तो अच्छा सिक्का एकदम बाजार से नदारद हो जाता है। खोटा सिक्का चलने की कोशिश करता है, अच्छे सिक्कों को हटा देता है। बुरे आदमी जब ताकत में हो जाते हैं, तो अच्छे आदमी को जगह-जगह से हटा देते हैं।


जीसस को किसने मारा? बुरे आदमियों ने, एक अच्छे आदमी की संभावना को! सुकरात को किसने जहर दिया? बुरे आदमियों ने, 'पोलिटीशियंस' ने, एक अच्छे आदमी को! अच्छा आदमी बुरे आदमियों के लिए बहुत अपमानजनक है। इसलिए अच्छे की संभावना तोड़ता है, जगह-जगह से तोड़ता है। बुरा आदमी अपने से भी बुरे आदमी चाहता है, जिनके बीच वह अच्छा मालूम पड़ सके। और इसलिए बुरा आदमी अपने चारों तरफ, अपने से बुरे आदमी इकट्ठे कर लेता है। बुद्ध अपने से ज्यादा बुद्ध इकट्ठा कर लेता है, उनका गुरु हो सकता है।


व्यक्ति को चुनिए, न कि पार्टी को : किसी देश में आज तक ऐसा नहीं है, कि हम अच्छे और बुरे आदमी को चुनने का विचार करें और इसलिए किसी देश में अभी भी ठीक लोकतंत्र पैदा नहीं हो सका है। लेकिन यह हो सकता है। लेकिन एक खयाल जकड़ जाता है, तो उससे अन्यथा सोचने में हमें कठिनाई मालूम पड़ती है। दल का एक खयाल पकड़ गया है कि दल के बिना राजनीति हो नहीं सकती। दल अगर होगा तो अच्छा आदमी कभी प्रवेश नहीं कर सकता। दल प्रवेश करेगा, आदमी का सवाल नहीं है।


यह सारी दुनिया की तकलीफ है, भारत की नहीं है। क्या हर्ज है, अगर पूरा मुल्क अच्छे आदमियों को चुने? उनके अपने विचार होंगे, अपनी धारणाएँ होंगी। हम 'पार्टी बेसिस' पर उन्हें नहीं चुनते। उनके अच्छे होने की वजह से चुनते हैं।


वे पचास आदमी इकट्ठे होकर दिल्ली में निर्णय करेंगे, वे पचास आदमी अपने बीच से चुनेंगे, वे ही निर्णय करेंगे। वहाँ दिल्ली की उनकी लोकसभा में पार्टियाँ हो सकती हैं, लेकिन पूरा मुल्क अच्छे आदमी की चिंता करके चुनेगा। दस अच्छे सोशलिस्ट चुने जाएँगे, दस अच्छे कांग्रेसी चुन जाएँगे। वे ऊपर जाकर निर्णय करेंगे। हमारे चुनाव का आधार पार्टी नहीं होगी, आदमी होगा। ऊपर पार्टियाँ होंगी, वह अपना निर्णय करेंगी, अपना प्रधानमंत्री बनाएँगी। वह दूसरी बात है। 


मुल्क अच्छे आदमी की दृष्टि से चुनाव करेगा तो बड़ा परिवर्तन हो जाएगा, बड़ी क्रांति हो जाएगी। अच्छे आदमियों की बड़ी जमात वहाँ इकट्ठी हो। तो मैं नहीं मानता हूँ, कि कोई पार्टी की सरकार होनी भी जरूरी है। अगर अच्छे लोगों की जमात हो तो अच्छे लोगों की सरकार हो सकती है। वह मिली-जुली हो सकती है। और मिली-जुली सरकार अच्छे आदमियों की हो सकती है। बुरे आदमियों की तो मिली-जुली सरकार नहीं हो सकती, असंभव है।


मेरा मानना यह है कि पार्टियों के दल पर देश को चुनाव करना नहीं चाहिए। देश का आम जन तो व्यक्ति की फिक्र करे, कि कैसा व्यक्तित्व, उसको चुने। ऊपर पार्टियाँ हो सकती हैं, वे मिल-जुलकर ही काम कर सकती हैं, इकट्ठे भी काम कर सकती हैं।


और भारत जैसे देश में मिल-जुलकर ही काम हो तो अच्छा है। एक पार्टी अगर मुल्क के अच्छे की बात भी करे, तो दूसरी पार्टी को सिर्फ इसलिए विरोध करना पड़ता है कि वह विरोधी है। उसे सब बाधाएँ खड़ी करनी पड़ती हैं, सब विरोध करना पड़ता है। सारे राजनीतिज्ञ चिल्लाते हैं, लोगों को समझाते हैं, 'को-आपरेशन' चाहिए, लेकिन उनसे पूछना चाहिए कि तुम्हारे बीच कितना 'को-आपरेशन' है। वहाँ कितना तुम मिल-जुलकर काम कर सकते हो। अगर कोई बढ़िया आदमी है, और वह दूसरी तरफ से आया है, दूसरी दिशा से, तो तुम कितना उसका उपयोग कर सकते हो?


पार्टी कहाँ ले गई आपको? वह तो एक पार्टी थी, तो ठीक था। कोई अव्यवस्था नहीं मालूम पड़ती थी। अब बराबर वजन की दस पार्टियाँ हो जाएँगी, तो रोज सरकार बदलेगी। और भारत जैसे गरीब मुल्क में, रोज सरकार का बदलना बहुत महँगा है। और रोज सरकार बदलें तो विकास क्या हो? गति क्या हो?


मेरी दृष्टि यह है कि पार्टी के ढंग से आपने चुनाव किया, तो अच्छे आदमी की खोज बहुत मुश्किल है। अच्छे आदमी की खोज पर चुनाव होने चाहिए, चाहे वह किसी पार्टी का हो।


'स्वर्णपाखी था जो कभी' पुस्तक से/सौजन्य ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन




28 अगस्त 2017

लोकतंत्र का किसान

#लोकतंत्र का #किसान

अभी धान के खेतों में निकउनी का समय है। किसान और मजदूर सुबह से ही धान की फसल के बीच से  #घास_फूस को चुन कर उसे जड़ से उखाड़ते है और अपने खेतों से बाहर फेंक देते है...ताकि वे धान की फसल को नुकसान न कर सकें... लोकतंत्र में यही घास_फूस धर्म और जाति की आड़ में #फल_फूल रहे है..आज जरूरत ऐसे किसान की जो इस अंतर को समझ सकें। वरना भारत भूमि को लहलहाने के लिए जितने भी उर्वरक दिए जा रहे सभी से घास फूस ही लहरा रहे है...

#मेरा_गांव_मेरा_देश

26 अगस्त 2017

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे

” यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥”
(गीता अध्याय ४ श्लोक ७ तथा ८)
(अर्थात – जब धरती पर स्थापित धर्म की हानि हो जाती है और उसके स्थान पर अधर्म और गंदी शक्तिया हावी हो जाती है तो मैं अवतार लेकर धरा पर उतर आता हूँ। मैं हर युग में अधर्म द्वारा धर्म को पहुँचाई गई हानि को दूर करने और साधु-संतों की रक्षा के लिए अवतार लेता हूँ। इस प्रकार मैं धर्म की फिर से स्थपना के साथ ही राक्षसों सरीखे दुष्टों को तहस- नहस कर देता हूँ।)

गीता की इस उक्ति को असंतो की दुर्गति के रूप में चरितार्थ होते हुए देखा जा सकता है। गुरमीत बाबा राम रहीम, स्वामी रामपाल, आसाराम बापू निर्मल बाबा, सहित अनेको व्यक्ति जिसने अपने आपको भगवान घोषित कर रखा और पाप कर्मों में लिप्त रहा उसकी दुर्गति गीता के इस श्लोक को प्रमाणित करते हुए यह भी बताता है कि ईश्वर हमेशा असंतों को सजा देता ही है।

गुरमीत राम रहीम के मामले में सीबीआई जज जगदीश सिंह ने जिस साहस और न्यायप्रियता के साथ एक अबला को इंसाफ देते हुए ईश्वर सरीखे उस आभामंडल को नष्ट कर दिया उससे उनके अंदर की ईश्वरीय शक्ति का भी आभास होता है

हालांकि वोट बैंक की राजनीति को लेकर जिस तरह से राजनैतिक पार्टियों के द्वारा ऐसे अघोरी बाबाओं को संरक्षित किया जाता है उससे यह बात भी सामने आती है कि लोकतंत्र में वोट बैंक मानवीय मूल्यों की स्थापना में पिछड़ जाता है।

20 अगस्त 2017

ओशो के विचार: सुखी रहने के सफल मंत्र


ओशो के विचार, सुखी रहने का सफल मंत्र
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दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दअसल, तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज सक्रिय हो जाती है। ध्यान सबसे बड़ी कुंजी है।

दुख को त्यागो। लगता है कि तुम दुख में मजा लेने वाले हो, तुम्हें कष्ट से प्रेम है। दुख से लगाव होना एक रोग है, यह विकृत प्रवृत्ति है, यह विक्षिप्तता है। यह प्राकृतिक नहीं है, यह बदसूरत है।

पर मुश्किल यह है कि सिखाया यही गया है। एक बात याद रखो कि मानवता पर रोग हावी रहा है, निरोग्य नहीं और इसका भी एक कारण है। असल में स्वस्थ व्यक्ति जिंदगी का मजा लेने में इतना व्यस्त रहता है कि वह दूसरों पर हावी होने की फिक्र ही नहीं करता।

अस्वस्थ व्यक्ति मजा ले ही नहीं सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है। जो गीत गा सकता है, जो नाच सकता है, वह नाचेगा और गाएगा, वह सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा। लेकिन जो नाच नहीं सकता, जो विकलांग है, जिसे लकवा मार गया है, वह कोने में पड़ा रहेगा और योजनाएँ बनाएगा कि दूसरों पर कैसे हावी हुआ जाए। वह कुटिल बन जाएगा। जो रचनाशील है, वह रचेगा। जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है।

जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं। वे हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं। वे राजनेता बन जाते हैं। वे पुरोहित बन जाते हैं। और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरो को भी नहीं करने दे सकते। इसलिए वे हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं।

जरा इसके पीछे का कारण देखो। अगर वह खुद जिंदगी का मजा नहीं ले सकता तो वह कम से कम तुम्हारे मजे में जहर तो घोल ही सकता है। इसीलिए सभी तरह के विकलांग एक जगह जमा होकर अपनी बुद्धि लगाते हैं ताकि जोरदार नैतिकता का ढाँचा खड़ा कर सकें और फिर उसके आधार पर हर चीज की भर्त्सना कर सकें। बस कुछ न कुछ नकारात्मक खोज निकालना है, वह तुम्हें मिल ही जाएगा, क्योंकि वह तो समस्त सकारात्मकता के अंग के रूप में होता ही है।

जब तुम प्रेम करते हो, तो नफरत भी कर सकते हो। जो व्यक्ति नपुंसक है और प्रेम नहीं कर सकता, वह हमेशा नकारात्मक पर ही जोर देगा। वह हमेशा नकारात्मक को ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करेगा। वह हमेशा तुमसे कहेगा- अगर तुम प्रेम में पड़े तो दुख उठाओगे। तुम जाल में फँस जाओगे, तुम्हें तकलीफें भोगनी होंगी। और, स्वाभाविक रूप से जब भी घृणा के क्षण आएँगे और तुम दुख का सामना करोगे तो तुम्हें वह व्यक्ति याद आएगा कि वह सही कहता था।
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फिर, घृणा के क्षण तो आने ही हैं। फिर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य रोगों के प्रति ज्यादा सचेत होता है न कि स्वास्थ्य के प्रति। जब स्वस्थ होते हो तो तुम अपने शरीर के बारे में भूल जाते हो। लेकिन, जैसे ही सिर दर्द होता है या और कोई दर्द, या फिर पेट का दर्द तो देह को नहीं भूल पाते। देह होती है तब, प्रमुखता से होती है, बड़े जोर से होती है, वह तुम्हारा दरवाजा खटखटाती है। वह तुम्हारा ध्यान खींचती है।

जब तुम प्रेम में होते हो और खुश होते हो तो भूल जाते हो। लेकिन, जब संघर्ष, नफरत और गुस्सा होता है तो तुम उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगते हो। ऊपर से वे विकलांग लोग, वे नैतिकतावादी, वे पुरोहित, वे राजनेता, वे मिल कर चिल्लाते हैं एक स्वर से कि देखो, हमने तुमसे पहले ही कहा था, और तुमने हमारी नहीं सुनी। प्रेम को त्यागो। प्रेम दुख बनाता है। इसे त्यागो, उसे त्यागो, जीवन को त्यागो। इन बातों को अगर बार-बार दोहराया जाता रहता है तो उनका असर होने लगता है। लोग उनके सम्मोहन में फँस जाते हैं।
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तुम कहते हो कि तुम उपवास करते रहे हो, तुमने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया है। उपवास का भला बुद्धत्व से क्या ताल्लुक हो सकता है? ब्रह्मचर्य का बुद्धत्व से कोई संबंध नहीं हो सकता? बेतुकी बात है। जो भी तुम करते हो जैसे कि तुम कहते हो कि मैं बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए रात-रात भर जागता रहता हूँ। दिन में बुद्धत्व प्राप्त करने की कोशिश क्यों नहीं करते? रात भर जागने की क्या जरूरत है? ये कुदरत के विरोध में तुम कयों खड़े हुए हो?

बुद्धत्व प्रकृति के खिलाफ नहीं होता। वह प्रकृति की परितृप्ति है। वह तो प्रकृति की चरम अभिव्यक्ति है। वह तो जितना संभव हो सकता है, उतनी प्रकृति है। प्रकृति के खिलाफ होने पर नहीं, बल्कि साथ होने पर ही तुम बुद्धत्व तक पहुँचते हो। वह बहाव के खिलाफ तैरने से नहीं, बल्कि उसके साथ बहने से मिलता है। नदी की यात्रा तो पहले से ही समुद्र की तरफ है। तुम्हें उसके खिलाफ तैरना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं, जबकि तुम करते यही रहे हो।

अब तुम पूछोगे कि तो मुझे क्या करना चाहिए? मैं कहूँगा कि दुख के प्रति अपनी आसक्ति त्याग दो। तुम बुद्धत्व की खोज नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम तो दुख की खोज में लगे हुए हो। बुद्धत्व तो सिर्फ एक बहाना है।

जीवन से प्रेम करो, और अधिक खुश रहो। जब तुम एकदम प्रसन्न होते हो, संभावना तभी होती है, वरना नहीं। कारण यह है कि दुख तुम्हें बंद कर देता है, सुख तुम्हें खोलता है। क्या तुमने यही बात अपने जीवन में नहीं देखी? जब भी तुम दुखी होते हो, बंद हो जाते हो, एक कठोर आवरण तुम्हें घेर लेता है। तुम खुद की सुरक्षा करने लगते हो, तुम एक कवच-सा ओढ़ लेते हो। वजह यह है कि तुम जानते हो कि तुम्हें पहले से काफी तकलीफ है और अब तुम और चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते। दुखी लोग हमेशा कठोर हो जाते हैं। उनकी नरमी खत्म हो जाती है, वे चट्टानों जैसे हो जाते हैं।

एक प्रसन्न व्यक्ति तो एक फूल की तरह है। उसे ऐसा वरदान मिला हुआ है कि वह सारी दुनिया को आशीर्वाद दे सकता है। वह ऐसे वरदान से संपन्न है कि खुलने की जुर्रत कर सकता है। उसके लिए खुलने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी कुछ कितना अच्छा है, कितना मित्रतापूर्ण है। पूरी प्रकृति उसकी मित्र है। वह क्यों डरने लगा? वह खुल सकता है। वह इस अस्तित्व का आतिथेय बन सकता है। वही होता है वह क्षण जब दिव्यता तुममें प्रवेश करती है। केवल उसी क्षण में प्रकाश तुममें प्रवेश करता है, और तुम बुद्धत्व प्राप्त करते हो।

साभार: दि रिवोल्यूशन पुस्तक से
प्रस्तुति:अरुण साथी

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