16 जून 2013

एक ही झटके में खलनायक हो गए नीतीश कुमार......

अरूण साथी
अभी कुछ ही महीने पहले तक नीतीश कुमार वैसे नायक की तरह उभरे थे जिन्होंने जंगलराज को सुशासन में बदल दिया था। देश ही नहीं दुनिया भर में इसकी चर्चा हो रही थी और बिहार का आम आवाम चैन से रहने लगा था। विपक्ष के पास कोई मुद्दा ही नहीं था सरकार को घेरने का। पर एक ही झटके में छद्म धर्मनिरपेक्षिता का ऐसा भूत नीतीश कुमार के सर पर सवार हुआ कि वे आवाम की नजरों में खलनायक हो गए।
राजनीति में अतिमहत्वाकांझी होने में कोई बुराई नहीं है क्यों राजनीति करने वालों को हमेशा से यही सिखाई जाती है पर नीतीश कुमार को बिहार के जनमानस को भांप कर कदम उठाना चाहिए था।
इससे पुर्व भी बिहार में रामविलास पासवान और लालू प्रसाद ने छद्म धर्मनिरपेक्षिता का स्वांग रचा था। रामविलास ने कुछ माह बचे होने पर केन्द्रिय मंत्रीमंडल से गोधरा कांड को लेकर इस्तीफा दे दिया और लालू प्रसाद ने आडवानी का रथ रोका और उन्हें गिरफ्तार किया। इतना ही नहीं लालू प्रसाद ने पोथी-पतरा जलाने का काम किया और पंडितों को अपमानित किया। सबक जनता ने सिखाया। आज दोनों राजनीति के हासिये पर चले गए। 
वही लालू प्रसाद आज पूजा-पाठ से लेकर मंदिरों में माथा टेकते फिर रहे है! मेरा कहने का मतलब यह कि धर्मनिरपेक्षिता का मतलब मुस्लमानों के तुष्टीकरण के लिए स्वांग करना नहीं होता? धर्मनिरपेक्षिता का मतलब सभी धर्मों के प्रति निरपेक्षता से होता है न कि मुस्लिम धर्म के प्रति सापेक्षिता से।
आज पूरे देश की राजनीति मुस्लमानों के तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति के इर्द गिर्द घूम रहा है। अखिलेश सरकार पुलिस के द्वारा जान पर खेल कर पकड़े गए कई आतंकवादियों से मुकदमा उठाने की राजनीति करते है तो कांग्रेस जम्मू कश्मीर में मारे गए आतंकियों के परिजनों को मुआवजा देने की ऐलान करती है। मतलब देश से बड़ा वोट बैंक हो गया....
इन सबसे एक कदम आगे बढ़ कर नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी का विरोध कर दिया। वह भी तब जब दंगे कराने के आरोपी मोदी को केन्द्र की एसआईटी ने बरी कर दिया और कोर्ट ने अभी तक दोषी नहीं माना है। और कानूनी पचड़े अलग भी जब गुजरात में दंगा हुआ तो नीतीश कुमार केन्द्र में मंत्री बने रहे। मोदी के साथ इनके अच्छे संबंध जगजाहीर है। फिर एकाएक प्रधानमंत्री बनने की अतिमहत्वाकांक्षा ने सब गुंड़ गोबर कर दिया और अंजाम के तौर पर विकास की राह पर चल पड़े बिहार की गाड़ी को  ब्रेक लग गया। सत्तरह साल पुराना गठबंधन टूट गया। कल तक जनता की मार से पस्त पड़े लालू प्रसाद दहाड़ने लगे। सरकार के विरोधी जश्न मनाने लगे है और यह सब वोट बैंक की राजनीति और मुस्लमानों के तुष्टीकरण के लिए किया गया जो की दुखद है।
गुजरात में जो हुआ वह निश्चित ही दुर्भाग्यपुर्ण था पर इस पर जो राजनीति हो रही है वह भी कम दुर्भाग्यपुर्ण नहीं। दंगे में चाहे जो भी मरे वह हिन्दु हो या मुस्लमान पहले इंसान है। गोधरा में रेलयात्रियों के जलाने पर खामोशी और गुजरात के दंगों पर हाय तौबा....बहुत सालती है। और फिर नरेन्द्र मोदी ही अकेल खलनायक कैसे? पिछले कुछ माह पुर्व युपी में लगातार दंगे हुए है जिसे मीडिया ने भी दबा कर रखा, वह क्या था? और अभी हाल में ही आसाम में हुए दंगे पर खामोशी क्यों? क्या कांग्रेसनित सरकार को दंगा कराने का लाइसेंस है? बात यह कि मुस्लमानों के तुष्टीकरण के नाम पर दोगली राजनीति से देश का भला नहीं होगा। यदि गुजरात में मुस्लमान आज नरेन्द्र मोदी को वोट दे रहे है तो जरा उनसे भी तो कोई पूछे?
इतने सालों के बाद गुजरात दंगे का परत दर परत खुलता भी गया है। जाकिया जाफरी, सितलबाड़ सहित कई अन्य इस राजनीति खेल में नंगे हुए है। 
आज देश की जनता कांग्रेसनित सरकार के त्रास से त्राण चाहती है और मोदी एक चेहरा के तौर पर उभरे जहां एक उम्मीद दिखी और बस इसलिए देश नमो नमो करने लगा और नीतीश कुमार सौतनिया डाह की तरह जल-भुंज कर ओलहन-परतर देकर कलह शुरू कर दिया। देहाती कहावत भी है घर फूटे गंवार लूट, तब लूटने वाला जश्न मना रहा है और लूटाने वाले को इसका एहसास नहीं...

09 जून 2013

कहीं कौमार्य परीक्षण तो कहीं सेक्स करने पर तीरअंदाज को निकाला, शर्म करो सरकार।

अरूण साथी
लगता ही नहीं कि हम आधुनिक युग में रह रहे है और उसी आदिम युग की रूढ़ीवाद हम पर आज भी हावी है। यदि ऐसा नहीं होता तो एमपी में 350 लड़कियों की शादी से पहले कौमार्य और गर्भवती होने की जांच नहीं होती और पूणे में विश्व तीरअंदाजी टीम की एक महिला और एक पुरूष तीरअंदाज कैंप में सेक्स करते हुए पकड़े जाने पर निकाल नहीं दिए जाते!
दोनों ही घटनाऐं विचलित करती है। पहली घटना एमपी सरकार ने वोट की राजनीति के तहत कन्यादान योजना चलाई है और इसके तहत सरकार अपने खर्चो पर शादी करवाती है और इसी शादी समारोह में भाग लेने वाली कन्याओं का कौमार्य और गर्भवती होने का परीक्षण किया गया। कितनी शर्म की बात है। जिन कन्याओं का सर्वाजनिक तौर पर यह कह दिया जाए की उसका कौमार्य भंग हो चुका है या वह शादी से पहले ही गर्भवती है उसके लिए जिन्दगी मौत के समान हो जाएगी। और खास बात यह कि इन लड़कियों में 90 आदिवासी लड़कियां है।
आज जब हम जानते है कि कौमार्य को तय करने वाली झिल्ली कड़ी मेहनत करने अथवा खेलने कूदने से फट जाती है तो फिर इस परीक्षण का क्या औचित्य? क्या यह उस अधिकारी की धृणित मानसिकता का परिचायक नहीं जिसने इस तरह का कार्य किया? 
अब इस तरह की धृणित कार्य के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माफी मांगी है और इसके जांच की जिम्मेवारी उसी जिले के अधिकारी को दिया गया है। साफ है कि इतना धृणित कार्य करने वाले अधिकारी को बचाने के लिए वहीं लीपापोती का खेल शुरू हो गया। 
वहीं दूसरी घटना झारखण्ड के पवन जाल्को एवं गंुजन कुमारी तीरअंदाज के साथ घटी। दोनों पूणा के कैंप में विश्व कप की तैयारी का प्रशिक्षण ले रहे थे। दोनों की उम्र 21 साल थी। दोनों राजी थे। दोनों ने आपसी सहमति से सेक्स किया। फिर कानून की कौन सी ऐसी धारा है जो यह कहे कि बालिगों को राजी से सेक्स करना अपराध है। पर दोनों को कैंप से निकाल दिया और अब दोनों विश्व चैंपियनशिप में भाग नहीं ले सकेगें।
आदीम युग की कट्टरता छोड़ने के बजाय हम उसे और बढ़ा रहे है। अफसोस की हम तब भी अपने को आधुनिक युग के वासी कहते है?

05 जून 2013

भ्रष्टाचार और बुढ़िया दादी (आंखों देखी)

इंदिरा आवास की गड़बड़ी जांचने बड़का साहेब गांव आए हुए थे। कमिश्नर साहब को लोग इसी नाम से पुकार रहे थे। कहा जाता है कि बड़का साहेब ईमनदार ऑफिसर है। एको रूपया घूस नहीं लेते। साहब एक सुदूरवर्ती गांव पहूंचे तो पाया कि एक बुढ़िया रो रही है। जांच हुआ तो पाया कि बु़िढ़या का इंदिरा आवास एक नंबर में बनना था पर अस्सी तक बन गया पर बुढ़िया का नंबर नहीं आया। साहेब ने बुढ़िया दादाी को बुलाया।
‘‘दादी घर क्यों नहीं बना।’’
‘‘की बनतै बउआ, मुखिया जी और बीडीओ साहेब पांच हजार रूपैया मांगो हलखिन त कहां से देतिए हल? एगो बेटा है सेहो पागल....’’
‘‘अच्छा अब बन जाएगा’’
बुढ़िया खुशी हो गई और अपने आंचल में बांधा ढ़ाई रूपया निकाल कर साहेब को देने लगी। बोली-
‘‘साहेब जानो हियै कि बिना घूस के कोय काम नै होबो है त हमरा पास बस इहे पैसा है ऐकरा रख लहो।’’
सहेब सन्न....। उनके निचले मुलाजिल को कोटो त खून नहीं। खांटी ईमानदार साहेब को घूस का ऑफर वह भी खुले आम..।
साहेब ने पैसा लेने से इंकर करते हुए बुढ़िया को समझाया-
‘‘दादी आपका घर बन जाएगा, चिंता नहीं करिए।’’
बुढ़िया उदास हो रोने लगी-
‘‘समझ गया साहेब हमर कोलनी नै बनत, बिना घूस लेले कोलनी कैसे बनत।’’
साहेब ने बुढ़िया को बुलाया और उससे ढ़ाई रूपया बतौर घूस रख लिया। वे समझ गए थे बिना पैसा लिए बुढ़िया दादी का विश्वास ही नहीं होगा। साहेब ने यह भी समझ लिया भ्रष्ट्राचार कितनी गहरी पैठ बना चुकी है।

गौरी, एक प्रेम कहानी

गैरी #अरुण साथी गौरी के लव मैरिज का पांचवां साल हुआ है। तीन बच्चों को वह आज अकेले चौका-बर्तन कर संभाल रही है। पति ने छोड़ दिया है। उसी पति ...