02 सितंबर 2011

अन्ना, मीडिया बनाम एलीट बुद्धिजीवी


अन्ना हजारे को लेकर मीडिया के कवरेज पर आज कल सवाल उठाए जा रहे है और इसकी गूंज संसद से लेकर सड़क तक देखने को मिल रही है। कल आईबीएन 7 पर इसको लेकर बहस भी कराई गई अन्य चैनलों और अखबारों के संपादकीय में यह मुददा बहस का विषय बना हुआ है। इन्हीं सवालों को लेकर मेरा मन भी कई दिनों से मथ रहा है और आज एक आम पाठक और दर्शक के रूप में मैं भी इन सवालों के जबाबों में उलझना चाहता हूं। सबसे पहले मैं चैनलों की बात करू तो अन्ना के आंदोलन के पूर्व चैनलों पर खुले आम सरकार के हाथो बिके होने का आरोप कथित बुद्विजीवी लगाया करतेे थे और जब भटटा परसोल में राहुल को कवरेज मिलती थी तो लगता भी ऐसा ही था और आम तौर पर मेरे जैसे दर्शक चैनल पर इस तरह की खबर आने पर रिमोट का सहारा ले लेते थे। पर अन्ना का आंदोलन की परस्थितियां इससे विपरीत थी। कुल मिला कर तेरह दिन में सोना-जागना अन्ना के आंदोलन के न्यूज को देखते हुए हुई। जब कभी भी किसी भी चैनल पर विज्ञापन अथवा अन्य खबर आई फिर से रिमोट का सहारा लिया और अन्ना की तलाश होने लगी। अपने कार्यालय में चंदा कर डीजल लाया और दिन दिन भर अन्ना का न्यूज देखता रहा। मैं ही नहीं मेरे साथ कई कई लोग अपने काम धंधे को छोड़ कर इस कार्य में जुटे रहे। यह जन भावना थी और इसी जन भावना को समझते हुए समाचार चैनलों ने अपनी जिम्मेवारी निभाई। कभी कभी तो ऐसा हुआ कि कई चैनलों पर विज्ञापन एक साथ आए तो फिर अन्ना की तलाश मे विजनस चैनल तक चला जाता जहां अन्ना ही दिखाया जा रहा था। 

इस कड़ी में मैं एक बाकया बताना चाहूंगा। बारहवे दिन जब संसद में बहस चल रही थी तब केबुल मे कुछ तकनीकी गड़बड़ी आ गई और प्रसारण कुछ देर के लिए रूक गया तो मेरे मित्र मनोज कुमार सहित कई लोगो को मोबाइल मुझे आ गया कि क्या हुआ, क्योंकि मेरा कार्यालय केबुल प्रसारणकर्ता कार्यालय के पास ही है। और मुझे जबाब देना पड़ा। ऐसा क्यों हुआ। क्यांेकि घरों में भी सपरिवार लोग अन्ना के साथ बैठे थे। मेरी बीबी आम गृहणी है। धरेलू महिला। आम दिनो मे वह सास बहू के सिरीयल को लेकर झगड़ जाती और घर मे न्यूज चैनल देखना दुभर हो जाता पर इन तेरह दिनो मे मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ?

यह एक सहज जन उभार का परिचायक है। अन्ना ने आम आदमी के दर्द को हवा दी और वह भी किसी महापुरूष की तरह नहीं, आम आदमी बन कर। अन्ना मंे लोगों को अपना चेहरा दिखा। वहीं सादगी, वही भदेशीपन! 

कल आशुतोष ने कहा कि मीडिया पर आरोप लगता है कि अन्ना को महापुरूष बना दिया और जबाब भी आशुतोष ने ही दिया कि मीडिया तो बाबा रामदेव से लेकर राहुल तक को फूल कवरेज दी वे क्यों नहीं महापुरूष बन गए? देहात में एक कहावत है दूध माफीक ही पानी मिलाया जाएगा। मतलब एक लीटर दूध में आप आधा लीटर पानी मिला सकते है पांच लीटर नहीं। वहीं बात मीडिया पर लागू है लोगों की भावनाओं को समझ मीडिया ने दूध में हिसाब से कुछ पानी उसमे मिलाया।

मुझे याद है जब आशुतोष ने एंकर की सीट से बोलते हुए कहा कि रामलीला मैदन में घटने वाली इस ऐतिहासिक घटना का मैं भी गवाह बनना चाहता हूं और अगले दिन वह रामलीला मैदान में माइक थामे नजर आए और देखने वालो को यह फर्क समझ में नहीं आ रहा था कि स्टूडियो में गोरा चिटटा, बेल मेंटेन दिखने वाला यह आदमी काला कलूटा क्यों दिख रहा है? कमर पर हाथ रखे जब आशुतोष बोल रहे थे मुझे लग रहा था जैसे दिन भर लहलहाती धूप मे हल जोतने के बाद कमर पर हाथ रख कर किसान थोड़ी देर के लिए सुस्ताना चाहता हो।

आईबीएन 7 की ही एक महिला रिर्पोटर ने चिलचिलाती धूप से बचने के लिए जब दुप्पटे को आंचल बना, सर पर रख एंकरिंग की तो ऐसा लग रहा था मानो धान की खेत में रोपनी रोपा रोपते हुए कजरी गा रही हो- सखी हे आइल देश के बरिया अब तो छोड़हो दिहरिया (चौखट) न....।

कुल मिला कर अन्ना के आंदोलन के कई निहितार्थ है जिसमें सबसे बड़ा यह कि आम आदमी को अन्ना के रूप में अपनी छवि नजर आती है। वहीं सांसद शरद यादव अन्ना और उनकी टीम पर व्यंग करते है और अरूंधंति राय और अरूणा राय सरीखे एलीट बुद्धिजीवी अन्ना पर सवाल खड़े करते है तो साफ झलक जाती है कि एक सातंवी जमात पास बुढा आदमी कैसे इन एलीटों से आगे चला गया। शरद यादव सरीखे कथित संपूर्ण क्रांति की उपज को खोर खोर कर खाने वाले नेताओ को भी लगता है कि इतने दिनो की राजनीति में भीड़ इक्कठा करने के लिए उन्हें भाड़े के लोग जुटाने पड़ते है पर रामलीला मे अन्ना के साथ लोग भुतियाल है।

हुर्रहुर्र की राजनीति करने वाले लालू जी के लिए तो प्रख्यात कवि अरूण कमल की यह रचना ही श्रेष्यकर रहेगी-

असत्य के प्रयोग?

किसने सोंचा था वह इस तरह जायेगा
कहता था मैं कौआ का मांस खाकर आया हूं
मरूंगा नहीं मैं इसी जगह राज करूंगा पूरा कलयुग
थर्र कांपता था पूरा ईलाका
दरोगा से मंत्री तक सब उसके जूते की गंध से पाते थे होश
बिना मंुडेर वाली छत से वह दिन भर मूतता रहता
आते जाते किसी भी आदमी के सिर पर खल खल 
ऐसा प्रताप था उसका
यही अर्थ था उस युग में न्याय का
और एक दिन
एक दिन मंुह अंधेरे जब बूढ़ी औरतें
जा रही थी गंगा नहाने भजन गाते टोल में
भागी चिल्लाते रोते कलपते
वह गिरा पड़ा था औधा गली में
रात में
आदतन उठा होगा मूतने 
मूतते मूतते बढ़ता गया होगा बिना मंुडेर की छत पर
और गिरा होगा भक्क मूतते अचक्के
अपने ही खून और पेशाब से डूबा
पड़ा है बीसवीं शताब्दी का एक और अजूबा।

इतिश्री

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