21 अप्रैल 2011

पत्रकारिता आखिर किसके लिए..........? बिहार के पंचायत चुनाव में नशे में धुत्त पुलिस ने बबाल काटा। पत्रकारों पर तानी राइफल।


बिहार का पंचायत चुनाव बहुत ही संवेदनशील होता है इसलिए मीडिया के लोगों को भी इसके लिए सतर्क रहना पड़ता है। शेखपुरा जिला के शेखोपुरसराय प्रखण्ड के सात पंचायतों में कल चुनाव था इसलिए मैंने भी विषेश तैयारी की जिसके तहत कैमरे से लेकर गाड़ी तक को टंच कर लिया। गर्मी अधिक होने की वजह से मोटरसाईकिल की जगह सुमो गाड़ी का जुगाड़ एक रिश्तेदर के पास से किया।

लफरा उस समय ही हो गया जब बीबी जान गई की सुमो गाड़ी से चुनाव कवरेज के लिए जाना है और रात में ही उसकी नाराजगी झेलनी पड़ी और अहले सुबह मैंने भी ताव खाया और बिना चाय-नास्ता के ही घर से निकल गया। बीबी का गुस्सा भी वाजिव था, घर में सामान लाने कहो तो पैसा नहीं और आज गाड़ी से जाऐगें।

चलो बिना खाये पिये घर से निकल गया। घीरे घीरे सभी साथी रिर्पोटर एकजुट हुए और कवरेज का दौर चलने लगा। सुमो गाड़ी  लेने का मकसद आराम नहीं था, बल्कि लैपटैप से चलते हुए न्यूज भेजना था और यह आईडिया कारगर रहा और हमलोग बुथों से चैनलों को रिर्पोटिंग करने लगे।

इस बीच कहीं नास्ते का जुगाड़ भी नहीं हो सका, सभी दुकाने बंद थी। आर्यन के रिर्पोटर शैलेन्द्र के ननिहाल वहीं था मोहब्बतपुर पंचायत में और बारह बजे के बाद वहां भोजन की योजना बनी और उसने अपने ननिहाल को इसकी सूचना दी और हम लोग वहां चल दिये। उसके ननिहाल में भोजन बनने में अभी आधा धंटा बाकी था पर चाय और विस्कुट मिल गई।

हम लोग चाय पी ही रहे थे कि सूचना मिली की उसी गांव के बुथ संख्या तीन पर पुलिस जवान नषे में धुत्त होकर महिलाओं कें साथ बदसलूकी कर रहा है। हम तीन साथी वहां से निकले और रास्ते में ही एक दलान पर शराब पीते पुलिस का जवान दिख गया। मैं तुरंत उस तरफ गया और कैमरा जैसे ही ऑन करना चाहा, जवान ने राइफल तान कर सटा दी और बोला चलो कैमरा ऑन करो इधर टीगर दबाता हूं। मैं डर गया और जवान वहां से निकलने लगा। इसी बीच मैंने कैमरा ऑन कर लिया और मेरे एक साथी धर्मेन्द्र, टीवी 99 के रिर्पोटर ने कैमरा ऑन किया। जवान उसकी तरफ झपटा और उसको मैं कैमरे में कैद करता रहा। फिर जवान नशे में धुत्त होकर गलियों मे राइफल लहराता रहा। कई बार हम लोगों की तरफ भी तान दी पर हम लोग उसको कवर करते रहे।

फिर चैनल को इसकी खबर की, ब्रकिंग न्यूज चला। फोनो चला और पदाधिकारियों को इसकी सूचना मिली और सभी दनादना वहां आये पर किसी पदाधिकारी को जवान के पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी अन्त में कसार थाना प्रभारी रामविलास सिंह एवं डीएसपी संतोष कुमार उसे समझते हुए गाड़ी में बैठने की बात कही तो जवान भड़क गया और उनसे भी उलझ गया।

खैर किसी तरह यह हाइ बोल्टेज खेल खत्म हुआ। इस बीच भूख से हाल बेहाल था, गर्मी अपने शबाब पर थी पर किसी को खाने की याद नहीं रही। हमलोग वहां से भागे और लैपटौप की बैटी चार्ज करने का जुगाड़ एक विडियो हॉल में किया और वहीं से न्यूज भेजा।

यह सब करते कराते तीन  बज  गए और जब सभी साथी के चैनलों में दो दो फाइल न्यूज चला गया तब हम लोगों को खाने की याद आई पर जहां खाना बना हुआ था वहां अब जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी वह थोड़ी दूरी पर था, सो बाजार से किसी तरह सत्तू लाने की जुगाड़ लगाया पर वह भी नहीं मिला। इसी बीच दैनिक जागरण रिर्पोटर रामजनम सिंह आये और कहा कि खाना का जुगाड़ करबा देते है चलो सब। हमलोग चल दिये। उन्होंने एक घर मे ले जाकर बैठा दिया। करीब चार बज रहे था खाना आया, चने की दाल, चावल, अचार, सब्जी। इसी बीच हमलोगों को यह पता चल गया कि यह मुखीया प्रत्याशी का घर है। मैं परेशान हो गया। कई मुखीया प्रत्याषी ने खाने के इंतजाम करने की बात कही थी, मुर्गा खाना है कि मीट, पर मैंने मना कर दिया था। यह रिर्पोटर के लिए यह सब अच्छा नहीं होगा, पर यहां भूख ने इतना बेचैन कर दिया कि किसी बात कर ध्यान हीं नहीं रहा और हमलोग खाने पर टूट गये। इस बीच एक मित्र ने कहा भी कि किसलिए तुम लोग यह सब करते हो, आठ माह से चैनल ने पैसा नहीं दिया तब भी मरते हो।


अन्त में ऑफिस आया, अखबार में खबर भेजनी है पर देह काम नहीं कर रहा था। बदन दर्द से टूट रहा था। खैर खबर भेजते हुए रात के नै बज गए और जब घर आया तो बेहोष हो गया। जब होष आया तो देखा कि बीबी सर मे तेल ठंढा तेल लगा रही है। रात भर दर्द से सो नहीं सका। शरीर थक गया और यह हाल भूख की वजह से हुआ।

जवान के हंगामे के बीच हमलोग चर्चा कर रहे थे कि जवान यदि गोली चला देता तो क्या होता? एक मित्र ने कहा, होता क्या अखबार में एक कॉलम की खबर लगती, चैनल को एक बढ़ीया खबर मिल जाती और बाल बच्चा ढनक जाता और क्या................?


सुबह सोंच रहा हूं कि यह सब क्यों और किस लिए करता हूं। पता नहीं यह कैसा पागलपन है। एक जुनून है.......

10 अप्रैल 2011

मैं अन्ना हजारे के साथ खड़ा नहीं हो सका! जब मीडिया भ्रष्ट है तब कैसा विरोध?


अन्ना हजारे ने जबसे अनशन पर बैठने की घोषणा की थी तबसे लगातार मेरे मन में उनके साथ होने की बात उठती रही और मैं कभी अपने शहर में  ही अनशन करने अथवा कभी मशाल जुलूस निकालने की बात सोचता रहा पर ऐसा कर न सका। मन में बार बार एक ही सवाल उठता रहा और किसी एक कोने से यह आवाज आती रही कि पहले अपने भ्रष्टाचार को खत्म करो फिर अन्ना का साथ दो और मैं उस समय जब पूरा देश अन्ना के साथ खड़ा था, मैं खड़ा नहीं हो सका।

सबसे पहले मैं मीडिया  की बात करता हूं जिसके भ्रष्टाचार का मैं विरोध भी नहीं सकता।मीडिया से जुड़े रर्पोटरों का जो हाल है वह सभी जानते है। सबसे पहले जिस चैनल के लिए मैं रिर्पोटिंग करता हूं उसके भ्रष्टाचार की बात कर लूं। साधना न्यूज चैनल से जबसे जुड़ा हूं कभी भी एकरार के अनुसार प्रति खबर 450 रू. नहीं दिया गया। जो मन हुआ वह चेक बना कर भेज दिया जाता है कभी चार महिने पर पांच हजार तो कभी आठ हजार। जबकि प्रति माह पच्चीस से तीस खबर भेजता हूँ और वह चलती भी है। जब कभी भी इस संबंध में जानकारी चाही तो टाल माटोल वाला जबाब मिलता है। अब तो पिछले आठ माह से एक भी पैसा नहीं दिया गया जबकि चैनल के ग्रुप एडिटर एन के सिंह शशिरंजन के चैनल छोड़ने के बाद पटना में बैठक कर इस बात से अवगत हुए और आश्वासन दिया कि आगे से ऐसा नहीं होगा पर उनके आश्वासन के कई माह बीत गए। 

यह हाल बहुतों न्यूज चैनलों का है। मेरे साथ कई साथी चैनलों से जुडे़ जिसमें इंडिया न्यूज से राहुल कुमार, ताजा न्यूज, युएनआई से संजीत तिवारी, आर्यन न्यूज से शैलेन्द्र पाण्डेय, टीवी 99, न्यूज 24 से धर्मेन्द्र कुमार, न्यूज वन से फैजी का नाम शामिल है पर किसी को भी कभी नियमित और निर्धारित राशि नहीं मिलती। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है। 

और मैं रोज रोज रिर्पोटरों को बसूली करते देखता हूं और चुप रहता हूं आखिर यह भी तो भ्रष्टाचार ही है।

उसी तरह समाचार पत्रों की बात करू तो स्तरीय पत्रों के द्वारा संवाददाताओं को 10 रू. प्रति समाचार दिया जाता है जबकि एक समाचार के संकलन के लिए जाने आने में इससे अधिक का खर्चा हो जाता है। उस पर भी विज्ञापन का भारी दबाब। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है। लगता है जैसे संवाददाताओं को मीडिया हाउस के लोग अप्रत्यक्ष रूप से यह कह कर भेजते है कि जाओं और कमाओ।


मीडिया हाउस से पैसा नहीं मिलने पर किस तरह से लोग छटपटातें है इसे मैं रोज महसूस करता हूं। विकल्प क्या बचता है। विकल्प है न और कुछ लोग उसे चुन भी लिया है जिसके तहत किसी के मौत की खबर कवर करने के लिए जाने पर भी आने जाने का खर्चा पानी के रूप में नकदी मांगी जाती है। शर्म से गड़ जाता हूं जब घर में आग लगने से जहां दो लोगों की मौत हो जाती है और इसकी खबर मुखीया के द्वारा पत्रकारों को दी जाती है पर पत्रकार खर्चा पानी का इकरार करा लेता है और वहीं समाचार बनाने के बाद मुखीया की बाइट ली जाती है और मुखीया से खर्चा पानी भी।

रोज रोज विज्ञापन के लोभ में सचाई की आवाज नहीं बन पाता हूँ और झूठ को दबा देता हूं क्योकि ऐसा करने वाला विज्ञापन दाता है और यह काम कौन मिडीयावाज नहीं करता?

इससे इतर भी कई तरह के भ्रष्टाचार में मैं रोज रोज शामिल होता है जिसमें से कुछ यहां लिखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा हूं। 

तब भला कैसे अन्ना के साथ खड़ा हो पाता?

और कितने लोग है जो कह सके कि राजा की तरह मौका मिले तो अरबों को धोटाला नहीं करेगें।

ईशा की बात मेरे मन में हमेशा घूमती रही कि पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप नहीं किया?

हां एक बात अब आप लोग भी मत कह देना, तब छोड़ क्यों नहीं देते ,  क्योंकि इसका जबाब है मेरे पास। मैं भी नशेबाज हूं और जैसे लोग शराब और गुटखे पर हजारों खर्चतें है मैं इन सब चीजों का सेवन नहीं करता ओर वचत कर पत्रकारिता पर खर्चता हूं बाकि कहने को आप स्वतंत्र है।

02 अप्रैल 2011

कतर से आये मेरे दोस्त शाहीद का एक नायब तोहफा।




यह एक नायाब तोहफा है जो मेरे दोस्त मो. शाहीद हसन ने खाड़ी के देश ‘‘कतर’’ से लाया है। नहीं यह महज एक मामुली सा चाबी रिंग नहीं है। यह इजहारे मोहब्बत का एक ऐसा नमूना है जिसने दिल को बाग-बाग कर दिया। 

मो. शाहीद हसन उर्फ पुटटू ने यह तोहफा कतर से खास अपने दोस्तों के लिए लाया है जिसमें अपने नाम के साथ अपने दोस्तों का नाम लगाया है। जब से यह तोहफा मिला है पता नहीं क्यों मैं बार बार इसे देखता  है  और कई तरह के सवाल मन को हिलकोर दे रही है। वेशक यह सवाल धर्म की है, राजनीति की है, जाति की है, नफरत की है और मोहब्बत की भी।

बेशक यह एक छोटा सा तोहफा है पर इसके अन्दर की भावनाओं को समझा जा सकता है। मेरे दोस्तों में कई मुस्लिम है जिनके साथ मेरा अपनापा है। इन अपनापों के बीच कई बार हिंदू मुस्लिम के नफरत की आग देश में लगी पर अपनापा और बढ़ता ही गया। इससे पहले मैंने एक आलेख लिखा था जिसमें मुस्लिम समाज के प्रति कुछ तल्ख टिप्पणी थी और उसका वाजिव तर्क भी था और आज भी एक वाजिव तर्क है मुस्लिम समाज के उदार होने का, उसके मोहब्बत का।

शाहीद हसन के अब्बा जान के देहान्त की वह घटना जब वह उस समय भी खाड़ी के देश में अपने परिवार के लिए नौकरी कर रहा था और इधर उसके अब्बा का जनाजा निकलना था। शाहीद के बड़े भईया साजिद हसन उर्फ बब्लू भैया ने हमलोंगों को खबर की और हमलोग तीन चार दोस्त उसके घर पर पहुंचे। पुटटू की कमी नहीं खले  इस लिए हमलोगों ने जनाजे को कंधा दिया। जनाजे के साथ साथ हमलोग फैजाबाद मोहल्ले में स्थित मस्जिद में रूके और नमाजे जनाज में भाग लिया। इतना ही नहीं मौलबी के द्वारा बोले गये शब्दों को दुहराया। यानि नमाज अदा की और फिर कब्रिस्तान में जाकर अब्बा को मिट्टी दी।

ईद का त्योहार मेरे लिये भी खास ही होती है और हम सभी साथी ईद के दिन जो उधम मचाते है और खाने को लेकर छीना छपटि होती है वह यादगार है।

साथ ही मैं यह भी साफ कर दूं कि पुटटू हीं नहीं कई अन्य साथी जिसमें मो. युनूस, मो. तनवीर खान शामिल है छठ पर्व पर मेरे घर आकर अथवा छठ घाट पर जाकर प्रसाद ग्रहण करता है। हिंदू धर्म में छठ का अपना ही एक स्थान है और उसके खरना दिन जो प्रसाद बनाता है उसे पवित्र माना जाता है पर उस प्रसाद को भी सभी दोस्त मिल कर ग्रहण करते है और मेरी मां का आर्शीवाद भी लिया जाता है।

कोई भी शादी हो या त्योहार हम लोग साथ साथ मनाते है नहीं लगता है कि हम लोग अलग है। 

कई बातें याद आ जाती है, जब सोंचता हूं। कोई भी समाज भला बुरा हो सकता है पर आदमी, आदमी होता है और इसका संबंध किसी समाज, किसी धर्म और किसी जाति से नहीं होकर आदमी से है।

01 अप्रैल 2011

काश की मैं मुर्ख होता........



काश की मैं मुर्ख  होता!

फटी जेब और टूटा नारा,
पैजामा का करे बेचारा,
होती गठरी खाली तो फिर क्या खोता?
काश की मैं मुर्ख  होता!

विद्धानों की महफिल में
आंख, कान, मुंह (नाक नहीं)
बंद कर रोता,
विद्वतजन कहलानें को 
कम से कम कांटा तो न बोता?
काश की मैं मुर्ख  होता!

न होती कोई भाषा,
न होता कोई मकसद,
न होता कोई देश,
न होती कोई सरहद,
न बनता अणु-परमाणु,
न सजती अपनी तबाही।
अपनों के लहू से धरती का आंचल नहीं भिंगोता? 
काश की मैं मुर्ख  होता!


खग ही जाने खग की भाषा,
हाथ न आता कभी निराशा,
नहीं ऐश्वर्या, नहीं नताशा,
नहीं मलाई, नहीं बताशा,
जाति-धर्म का नहीं तमाशा।
तकिये को पैरों तर रख कर,
घोड़ा बेचकर सोता।
काश की मैं मुर्ख  होता!


बीबी से डरता,
प्रेमिका पे मरता,
अपनी खाली कर, औरों की जेब भरता।
अपनी उपेक्षा पर न कभी सुर्ख  होता?

काश की मैं मुर्ख  होता!

काश की मैं मुर्ख  होता!
काश की मैं मुर्ख  होता!

काश की मैं मुर्ख  होता!


चित्र गूगल से साभार 

ओशो के विचार: सुखी रहने के सफल मंत्र

ओशो के विचार, सुखी रहने का सफल मंत्र ** दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दअसल, तुम जिस पर ध्यान देते हो...