29 जनवरी 2011

बिहार में प्रशासनिक तानाशाही, जनता दरबार मे फरीयाद लेकर गए युवक को जिलाधिकारी ने भेजा जेल।


बिहार में सत्तारूढ सरकार और उनके कारींदों की तानाशाही सामने आने लगी है। इस तानाशाही का नतीजा है की जनता दरबार मे फरीयाद लेकर गए युवक को जिलाधिकारी के आदेश पर जेल भेज दिया गया। मामला शेखपुरा जिले के नगर परिषद क्षेत्र के बार्ड संख्या 22 का है। बार्ड संख्या 22 में राशन किरासन नहीं मिलने से परेशान बड़ी संख्या में लोगों ने सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्त्ता विनोद दास से इसकी गुहार लगाई । मामला संगीन था। मामला यह था कि वहां लाल कार्ड बाहर से लाल और अंदर से हरा था जिसकी वजह से गरीबों को अनाज और किरासन नहीं मिल पाती थी जिसको लेकर बिनोद दास ने अपने भाई वार्ड सदस्य के विरूद्व जिलाधिकारी के जनता दरबार मे दो तीन बार गुहार लगाई पर महीनो बीत जाने के बाद भी इस पर कोई कार्यबाई नहीं हुई तो बिनोद दास ने बार्ड के लोगों के साथ जिलाधिकारी धर्मेन्द्र सिंह के जनता दरबार में पहूंच गए। जब विनोद दास को फिर आश्वासन मिला तो बिनोद दास ने समाहरणालय से मुख्य द्वार महिलाओं के साथ नारेबाजी करने लगे तब जिलाधिकारी ने बिनोद दास को फिर से बार्ता के लिए बुलाया और उसके बाद पुलिस के हवाले कर दिया। बिनोद दास पर बिना आदेश लिए समाहरणालय परिसर मे हंगामा करने का आरोप लगाया गया है। इस आरोप में बिनोद दास जेल मे बंद है। इस घटना के बाद जिलाधिकारी ने सभी मीडिया कर्मियों को समाचार को प्रकाशित नहीं करने की धमकी दी नही ंतो उनके उपर भी एफआईआर दर्ज करने की बात कही। घटना की खबर तो अखबारों मे प्रकाशित हुई पर प्रमुखता से नहीं। चैनलों  में भी कुछ लोगों ने खबर को भेजा पर खबर के प्रति ध्यान नहीं दिया गया।

26 जनवरी 2011

अपने ही देश में तिरंगा पराया हो जाएगा। -----कविता





किसने सोंचा था

‘‘केसरिया’’

आतंक के नाम से जाना जाएगा।

‘‘सादा’’ 

की सच्चाई गांधी जी के साथ जाएगा।

‘‘हरियाली’’ 

के देश में किसान भूख से मर जाएगा।

और 

कफन लूट लूट कर स्वीस बैंक भर जाएगा।


किसने सोंचा था

लोकतंत्र में

गांधीजी की राह चलने वाला मारा जाएगा।

आज भी भगत सिंह फ़ांसी के फंदे पर चढ़ जाएगा।

किसने सोंचा था

भाई भाई का रक्त बहायेगा।

देश के सियाशतदां आतंकियों के साथ जाएगा।

अपने ही देश में तिरंगा पराया हो जाएगा।

और हमारा देश

शान से

आजादी का जश्न मनाएगा।


जय हिंद।




(चित्र- एम. एफ़. हुसैन)


22 जनवरी 2011

26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस... चैंकिए मत नमूना देखिए।


26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस है। जी हां यह मनना है बरबीघा प्रखण्ड विकास पदाधिकारी का। बरबीघा प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के द्वारा 26 जनवरी को झण्डोत्तोलन को जो आमंत्रण पत्र अपने हस्ताक्षर से जारी किया गया है उसमें 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस होने की बात कही गई।

ऐसा करने वाले महोदय प्रखण्ड विकास पदाधिकारी वे है जिन्हें नीतीश कुमार की सरकार ने प्रमोट कर वीडियो बनाया है।
पत्र का नमूना

पत्र का मजमून कुछ इस तरह का है। कार्यालय, प्रखण्ड विकास पदाधिकारी बरबीघा, अन्य वर्षों के भांति इस वर्ष भी स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन 26 जनवरी 2011 को प्रखण्ड कार्यालय के प्रांगण में 8. 30 बजे प्रातः झण्डोतोलन किया जाएगा जिसमें आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है। इसके बाद नीचे में प्रखण्ड विकास पदाधिकारी का हस्ताक्षर किया गया है। इस पत्र के माध्यम से प्रखण्ड प्रमुख, अंचलाधिकारी, आरक्षी निरीक्षक सहित अन्य लोगों को आमंत्रित किया गया है। इस पत्र के माध्यम से लोगों को झण्डोतोलन की जानकारी दी गई है पर गणतंत्रता दिवस की जगह स्वतंत्रता दिवस लिख दिया गया और इस बात की चर्चा बरबीघा में जोरों पर है। जब पदाधिकारी के द्वारा इस तरह की गलती की जा सकती है तो आम लोगों को क्या हाल होगा समझा जा सकता है।

16 जनवरी 2011

और वह गुमनाम मसीहा अनन्त की यात्रा पर निकल गये..........................




वक्त के जिस पड़ाव पर जिन्दगी थम जाती है वहां से जिस मसीहा ने समाज के नवनिर्माण की नींव रखी और नई जिन्दगी की शुरूआत की वह गुमनाम मसीहा आज सो गये। लाल दिप-दिप उर्जा से लबरेज उस चेहरे को जिसने भी देखा सदा मुस्कुराता पाया। वह गुमनाम मसीहा थे उच्च विद्यालय के सेवानिवृत शिक्षक लालो पाण्डेय, जिनका बीती रात 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 
आज अपनी काहिली पर भी दो आंसू मेरे निकल आए, पिछले कई महीनों से सोच रहा था कि लालो पाण्डेय की जीवनी पर एक स्टोरी अखबार में निकाले और इसको लेकर दो बार गया भी पर उनसे मुलाकात (दुर्भाग्यवश या है कि मेरे किस्मत में यह नहीं था।) नहीं हो सकी। एक बार शाम में वे खाना खा कर सोने चले गये थे और दूसरी बार शहर से बाहर थे, खैर आज उस गुमनाम मसीहा के शरीर से बाहर जाने और सदा के लिए सो जाने की खबर मिली तो दिल दुखी हो गया। 

इस युग में जहां लोग ‘‘अर्थ’’ को भगवान मान पूजते है और शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है वहीं उन्होंने शि़क्षा दान का रास्ता अपने लिए चुना। सुबह से ही शिक्षा दान का अलख वे जगाते थे और उनके घर पर वैसे छात्र-छात्राओं का तांता लगा रहता था जिसके पास ट्यूशन और कोचिंग करने के प्रयाप्त पैसे नहीं रहते थे। सुबह से लेकर रात्री आठ बजे तक वह गुमनाम आदमी पांचवी से लेकर इण्टर तक के विधार्थियों को निःस्वार्थ सेवा करते रहते। उनकी अंग्रेजी पढ़ाने की शैली का सभी लोग कायल थे और जिस विधार्थी को अन्य जगहों पर अंग्रेजी समझ में नहीं आती वे लालो पाण्डेय के यहां अंग्रेजी सीखने जाते थे।

लालो पाण्डेय सामस उच्च विद्यालय में भी एक दशक से अधिक अपनी सेवा दी और वहां भी वे छात्रावास में छात्रों के बीच रहते हुए निःशुल्क विद्यालय के बाद शिक्षा का दान दिया करते। इसी शिक्षा दान को याद करते हुए उनके शिष्य एवं कवि अरविंद मानव आज बेजार रो रहे थे।


वे आजीवन डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल के अध्यक्ष रहे और एक पैसे का कभी मोह नहीं किया। कितनी बार उनसे मुलाकात हुई और जब भी प्रणाम करता एक उर्जावान मुस्कुराहट के रूप में खुश रहने का आर्शिवाद मिलता उन्होंने कभी अपने बारे में नहीं बताया और चुपचाप शिक्षा का दान देते रहे।
अभी हाल ही में 31 दिसम्बर के डिवाइन लाइट के द्वारा उनका जन्म दिन मनाया गया था और उसमें मैं भी शरीका हुआ था। लोगों ने उनकी लम्बी उम्र की कामना की थी और उनके चेहरे पर हमेशा की तरह चिरपरिचित मुस्कुराहट छाई रही। शायद ईश्वर ने किसी की न सुनी और एक मुस्कुराता हुआ बुद्ध इस नश्वर युग में निःपाप अन्न्त की यात्रा पर चले गये।

उनकी याद में बरबस लेखनी से निकल गई


जब भी कोई बुद्ध आएगा

वह चुपचाप मुस्कुराएगा
इस नश्वर संसार में 
वह सबको कुछ न कुछ देने आएग
और सभी को युग निर्माण का रास्ता बताएगा। 
‘‘अर्थ‘‘ ही भगवान है
इस तर्क जाल से उलझ 
खामोश हो जाने वालो को

अडिग रहने का हौसला दे जाएगा। 

15 जनवरी 2011

मेरे देश में



मेरे देश में

पिज्जा
एम्बुलेंस से पहले पहूंचती
लूट के बाद पुलिस सजती

मेरे देश में
कार लोन पांच परसेंट पर
एडुकेशन लोन बारह पर मिलती

मेरे देश में
चावल बिकता चालीस रूपये
सिम है मुफ्त में मिलती

मेरे देश में
रही नहीं उम्मीद कहीं अब
चौथेखंभे  से लेकर न्याय तलक है बिकती
मेरे देश में.......


14 जनवरी 2011

मकरसंक्रांति की हार्दीक शुभकामनाए.. रिश्तों की डोर जोड़ने वाला त्यौहार है मकरसंक्रान्ति। दही चूड़ा खा कर आराम कर रहा हूं।

दही चूड़ा के नाम से प्रसिद्व मकरसंक्रान्ति का त्योहार भले ही परंपरागत रूप से मनाया जाता है पर इस त्योहार का अपना एक अलग मायने है और यह त्योहार रिश्तों की डोर जोड़ने वाला प्रमुख त्योहार है।

कल ही लक्खीसराय के नन्दनामा गांव से लौटा हूं मोटरसाईकिल पर एक बोरा लाद कर सब्जी इत्यादी ले गया और फिर एक रात वहां रहा, जम कर कुटुमतारे की और फिर वहां से चूड़ा, फरही का चावल मोटरसाईकिल पर लाद कर लाया। मेरे यहां ंसुखा की वजह से धान नहीं हुआ सो चूड़ा की किल्लत है।

नन्दनामा मेरे दादा जी के बहन का ससुराल है और दादी फुआ का निधन सौ साल की उर्म में अभी पिछले साल ही हुआ है और जब से होश संभाला है वहां न्यैता लेकर मैं ही जाता हंू सो इस बार भी कड़ाके की ठंढ में मोटरसाईकिल चला कर 60 किलोमिटर गया।

इसी तरह अन्य रिश्तेदारो के यहां भी  न्यौता जाता है।

आज दही चूड़ा खाने का त्योहार है सो घर में बस आलूदम बना है और उसके साथ दही चूड़ा और तिलकुट खाकर आराम फरमा रहा हूं।

इस त्योहार की प्रमुखता है कि अपने अपनों को याद करते है और इसकी पहचान भी इससे होती है। रिश्तों की डोर जोड़ने वाला त्योहार मकरसंक्रान्ति को देखना हो तो बस स्टेण्ड और रेलवे स्टेशन पर देखा जा सकता है। एक सप्ताह पूर्व से इस त्योहार में अमीर से लेकर गरीबा तक अपने रिश्तेदारों के यहां न्योता पहूंचाने जाते है और इसको लेकर भाड़ी भीड़ देखी जा रही है। इस त्योहार की खासियत है कि कोई दही चूड़ा तो कोई मीठ्ठा लेकर अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाने जाते है। यह परंपरा गांवों में प्रमुखता से देखी जाती है तथा जिस गांव में जिस तरह की फसल होती है उसे अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाते है और उनके रिश्तेदार भी अपने यहां से कोई न कोई सौगात देते है। इसको लेकर जहां बरबीघा ईलाके से दीयारा क्षेत्र में लोग चूड़ा पहूंचाने जाते है तो वहां से प्रमुखता से लोग प्रसिद्व दही अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाते है। शेखोपुरसराय प्रखण्ड से लोग ईख और मिठठा अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाते है तो सब्जी उत्पादक गांवों से प्रमुखता से सब्जी अपने रिश्तेदारो के यहां भेजते है। 
बताया जाता है कि यह परंपरा सदियों से है और इसका पालन अभी गांवों के लोगों के द्वारा किया जा रहा है।

कथा शिल्पी फनिश्वर नाथ रेणु की पत्नी का निधन



मैला आंचल के बहाने गांव के कथा शिल्पकार स्व. फनिश्वर नाथ रेणु की पत्नी लतिका का निधन हो गया। गुरूवार की सुबह अचानक उनका निधन हो गया। वे कई दिनों से अस्वस्थ चल रही थी। वे 86 साल की थी।

लतिका रेणु स्व. रेणु की दूसरी पत्नी थी और वे रेणु की पैतृक गांव अररिया के हिंगना औराही में रह रही थी। उनके निधन पर रेणु की पहली पत्नी पद्मा का बुरा हाल है और उनके आंसू रोके नहीं रूक रहे। लतिका के पुत्र पद्म पराग वेणु जो वर्तमान मे फारविसगंज से विधायक है मुख्यमंत्री के मां के निधन पर शोक प्रकट करने के लिए पटना गये हुए थे और उनके आने के बाद शुक्रबार को लतिका का अंतिम संस्कार किया जाएगा।

ज्ञात हो कि लतिका रेणु स्व. फनिश्वर नाथ रेणु के प्रसिद्ध उपान्यास मैला आंचल के प्रकाशन में महत्वपुर्ण भूमिका निभाई और उन्होने अपने गहने तक बेच दिये।

11 जनवरी 2011

फिनिक्स





पाने की अभिलाषा में 
जल जाता है 
फिनिक्स

सुर्य को पाना चाहता है
सदियों से 
कितना मुर्ख है
फिनिक्स

फिनिक्स और मुझमें
कितनी समानता है।

10 जनवरी 2011

सेक्स सकेंडल- विधायक की हत्या में सजीश के तहत गिरफ्तार पत्रकार पर क्यों खामोश है मीडिया।


यह किसी फिल्मी कहानी सा है जिसमें रसूख के दम पर यौनशोषण की बात को दबा दी जाती है और फिर शोषिता के बेटी पर नजर खलनायक का आता है तब नायका के द्वारा अपनी जान की परवाह किये बिना खलनायक की हत्या कर दी जाती है और फिर  इस पूरे प्रकरण में नायका के सच का राज जानने वाले एक पत्रकार को पुलिस राज दफनाने के लिए गिरफ्तार कर जेल में ढूस देता है। 

यह अगर फिल्म में होता तो फिल्म में दर्शकों के द्वारा तालियां बजाई जाती और फिल्म सुपरहिट भी हो जाता पर नहीं यह एक हकीकत है। 

यह हकीकत है पुर्णिया के विधायक राजकिशोर केशरी के हत्या के बाद रूपम पाठक का समर्पन और पत्रकार तथा साप्ताहिक क्विसलिंग के संपादक को आनन फानन नामजद कर पुलिस के द्वारा घर से पहले अपहरण किया जाना और दो दिन बाद प्रताड़ित करने के बाद जेल भेजना।

पुर्णिया के भाजपा विधायक की हत्या की नायका है रूपम पाठक पर इस कहानी के कई पर्दे अभी उठने बाकि है। यह घटना यदि दिल्ली सरीखे महानगर की होती तो मीडिया इसमें टीआरपी देखती और फिर जेसीका और अरूषी हत्याकांड की तरह इसे उछालती पर यह मामला है बिहार के एक जिले पुर्णिया का और उसपर भी सुशासन का रागदरबारी बजाने वाली मीडिया कैसे एकाएक कुसाशान का राग छेड़ दे।

रूपम पाठक प्रकरण में कुछ बातें है जो आपको भी उद्वेलित करेगी। पहला तो यह कि जब रूपम पाठक ने विधायक की हत्या की तब पकड़े जाने के बाद जो उद्गार उसके मुंह से निकला वह था मुझे फांसी दे दो। रूपम ने कभी नहीं कहा कि उसने गलती की है वह मानती है कि उसने न्याय किया है।

रूपम कौन है

रूपम पुर्णिया में राजहंस नामक एक नीजि विद्यालय की संचालिका और सुशिक्षित महिला है और इस मामले में यौनशोषण की बात सामने आती है। यौनशोषण का यह मामला रूपम के पहले रजामंदी से भी हो सकता है और इस यौनशोषण के मामले मे अवैध संबंधों को लेकर मैं कुछ नहीं कहना चाहता। पर सवाल यह है कि जब रूपम ने यौनशोषण का मामला दर्ज 28 मई को कराया तब बिहार की पुलिस और यहां की सरकार ने क्या किया इस पर नजर डाले। 28 मई को मामला दर्ज हुआ और आनन फानन में 30 मई को हमारे उपमुख्यमंत्री पुर्णिया पहूंचकर इस मामले को ब्लौकमेलिंग बताते हुए इसमें विधायक को क्लिन चिट देेते है। भला कौन सी ऐसी मजबूरी रही की उपमुख्यमंत्री ने कुछ दिन इंतजार कर इसकी जांच कराने की जहमत नहंी उठाई।

फिर रूपम पाठक पर कितना दबाब रहा होगा समझा जा सकता है। जिसके पक्ष में राज्य का उपमुख्यमंत्री कूद का पहूंच गया हो वहां पुलिस क्या न्याय कर पाएगी?

फिर इस मामले में रूपम पाठक ने मामला वापस ले लिया। इसके लिए कितना दबाब रहा होगा।

अन्ततः इस मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब रूपम में विधायक की हत्या कर दी। और फिर जंगल में आग की तरह मामला पुर्णिया का बच्चा बच्चा जानता है कि विधायक और उसके सिपहसलार विपीन राय रूपम पाठक की 16 साल की बेटी पर नजर डाल दिया और दबाब बनाने लगा। जब सरकार ही उसके साथ है तो रूपम क्या करती?

इस पूरे मामले की अहम जानकारी संपादक नवलेश पाठक के पास थी और उन्होंने ही अपनी अंग्रेजी विकली क्विंसलिंग में पहली बार रूपम का दर्द प्रकाशित किया और इतना ही नहीं उन्होने सच की आवाज बुलंद करने के लिए 1 जुलाई नेताओं की पोल खोलने के लिए सेक्स रैकेट में भागीदार लड़कियों का बयान प्रकाशित किया जिसका शिर्षक था यस! वी इंटरटेंड पालीटिशियंस। नवलेश बुलंदी से पत्रकारिता का अलख जगा रहे थे और पुर्णिय विधायक के हत्या के कई धंटे बाद दर्ज प्राथमिकी में उनका नाम घसीटा गया। 

इस सारे प्रकरण में नवलेश को लपेटने के पीछे इस राज से पर्दा उठने से रोकना है कि कैसे नेताओं के द्वारा सेक्स के आनंद के लिए किसी भी सीमा को लंघ दिया जाता है।

अब इस प्रकरण में सीबीआई जांच की सिफारिश नीतीश कुमार ने की है पर पहले जरा अपनी पुलिस को ही इसकी निष्पक्ष जांच करने के लिए कह तो दें, देखिए दूध का दूध और पानी का पानी होता हे कि नहीं। पर नहीं बिहार के मुखीया को अपनी छवि बाहर से साफ दिखानी है और इसके लिए सीबीआई जांच एक माध्यम बना।

बहुत दुःख होता है जब बिहार पुलिस के पुर्णिया रंेज के डीआईजी अमित कुमार से पुलिस ने पुछा कि यौनशोषण के मामले में क्या कर रहें हैं तो उनका जबाब था अभी हत्या के मामले की बात हो रही है यौनशोषण की नहीं। 

अंत में मैं भी रूपम पाठक के मां कुमुद मिश्रा कें इस कथन के साथ हूं की उसकी बेटी दुर्गा है।

पर एक बात है इस पूरे कथानक की नायका पाठक यदि महानगर की होती तो मीडिया के लिए यह एक बड़ा टीआरपी मशाला होता पर अफसोस यह पुर्णिया जैसे छोटे नगर की बात है जहां के बेटियों की लुटती अस्मत महानगर के निवासियों के लिए मायने नहीं रखती और यह मात्र एक साधरण खबर भर बन कर रह जाती है।

09 जनवरी 2011

सरकार की गलत नीतियों की वजह से देश में गरीबीं।

भारत में कृषि अन्तरिक उपनिवेश का शिकार।

गरीबी मापदण्ड को सुधारे बिना खाद्य सुरक्षा अधिनियम बेमानी।

भारत में गरीबी का सबसे बड़ा कारक सरकार की गलत नीतियॉ है और जवाहर लाल नेहरू ने पाश्चातय नीतियों के प्रभाव में आकर देश में औधौगिकीकरण कारण पर घ्यान दिया जिससे किसानों की स्थिति दयनीय हो गई और कृषि को अन्तरिक उपनिवेश की तरह इस्तेमाल करते हुए इसका शोषण किया गया। उक्त बाते प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं जवाहर लाल नेहरू विश्वविधालय के सेवा  निवृत प्रध्यापक ईश्वरी प्रसाद ने कही। ईश्वरी प्रसाद खाद्य सुरक्षा एवं गरीबी उन्मूलन पर आयोजित व्याख्यानमाला को संबोधित कर रहे हैं। इसका आयोजन बरबीघा एसकेआर कॉलेज में लाला बाबू की जयंती पर किया गाय था। इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा भारत के आजादी का सपना आज भी शोषकों के द्वारा जारी शोषण की वजह से अधूरा है। उन्हांेने कहा भारत सरकार को गरीबी की पहचान का मापदंड बदलना होगा। देश के लिए जाति प्रथा को सबसे खतरनाक बताया। देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करते हुए श्री प्रसाद ने कहा कि 16 प्रतिशत  बजट खर्च से देश का 65 प्रतिशत किसान जीता है। उन्होंने गरीबी का मापदण्ड सिर्फ भोजन को नहीं मानने पर जोर देते हुए जीवन यापन की सभी मूलभूत चीजों को इसमें शामिल करने पर बल दिया। तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट की चर्चा करते हुए उन्होंने 37 प्रतिशत गरीब को 35 किलो अनाज 2 से 3 रूपया पर देने की योजना को सही नहींे बताया।
औधोगिकीकरण पर प्रहार करते हुए ईश्वरी प्रसाद ने साफ कहा कि दुनिया के किसी देश के पास इतनी क्षमता नहीं की बेरोजगारों को रोजगार दे सके यह क्षमता कृषि क्षेत्र को ही है। सरकार के ग्रोथ रेट को ढकोसला बताते हुए कहा इससे देश का विकास नहीं होगा। देश में आज जिस अनुपात में खरबपति बढ़ रहे है उसी अनुपात में गरीबी भी बढ़ रही है। स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए प्रो0 ईश्वरी ने कहा कि इसके अनुसार 37 प्रतिशत किसान खेती नहीं करना चाहते है जबकि मेरा मानना है कि 100 प्रतिशत किसान खेती नहीं करना चाहते। खेती में उत्पादन लागत अधिक होना और बिक्री के लिए बाजार नहीं होना इसका मुख्य कारक है।
बिहार विकास की खींचाई करते हुए ईश्वरी प्रसाद ने कहा की रोड का बनना विकास नहीं है बल्कि उर्वरक बिजली और खेती में सुधार को बिहार का असली विकास माना जाएगा। व्याख्यान माला में खेती को मजबूत कर देश के विकास की परिकल्पना का खाका खिंचते हुए उन्होंने किसानों को सबसे अधिक जोखिम लेने वाला  व्यापारी करार दिया। 

ठंढ से ठिठुरती जिंदगी में महादलितों का हाल बेहाल।



‘‘ये गो कंबल बाबू कही से मिल जाइतै हल तो इ पूस के सर्दीया कट जाइतै हाल, बड़ी सर्दी है बाउआ लगो है परणा ल केे जइतै’’ यह कह रहा  है आज का हलकू, प्रेम चन्द की कहानी पूस की रात का नायक दशकों बाद भी गॉव और गरीब-दलित टोलों में देखने को मिल जाता है। दशकों पूर्व प्रेमचंद ने जिस पूस की रात में कड़ाके की सर्दी और एक कंबल की जद्दोजहद का चित्रण किया था जिन्दगी की वह जद्दोजहद आज भी जारी है। हाड़कंपाने वाली सर्दी और शीतलहर के लोगों को कंपकंपा कर रख दिया है। इससे बचने के लिए लोग घरों में दुबके रह रहे है पर महादलित समूदाय के लोगों के पास घर भी नहीं जहॉ दुबक कर पूस की रात काट सके। बिना किबाड़ की फूस की झोपड़ी का एक कमरा जिसमें बारह परिवार समा जाते हैं, बच्चों के तन पर चेथड़ी होती और बगल में आग  जला कर मॉ उसे अपने पास समेटे रहती है। बगल में कुत्ता और सुअर भी ठंड से थरथरा रहा होता है और यह नजारा गॉव के मूसहर टोली में देखने को मिल जाते हैं । 

जिला मूख्यालय से पच्चीस किलोमीटर दूर कासीबीघा, शेरपर, ब्रहम्पुरा सहित कई गॉवों की मूसहरी का जब अहले सूबह जायजा लिया तो कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। शेरपर मुसहरी में प्रवेश करते ही जैसे की कैमरा ऑन किया रमेसर की पत्नी भड़क जाती है ‘‘कहेले फोटूआ घींचो हो, जाडा में मर रहिलीऐं और एगो कंबल नै है।’’ वही चुल्हा पर खाना बना रही परबती के  बगल में चुल्हे से चिपके है बच्चे। आगे एक मॉ अपने तीन बच्चों के साथ लगभग बुझ चुकी अंगीठी के सहारे सर्दी का मुकाबला करती हुई दिख जाती है।


ठिठुरती हुई पूस की शाम में नगर पंचायत का हाल भी बेहाल दिखता है और इस  बेहाली में भी प्रशासन की नींद नहीं टूटी है। अमीर लोग तो घरों में अलाव की व्यवस्था कर ठंढ से मुकाबला कर लेते है पर गरीब का सहारा सरकारी अलाव ही होता है और वह भी इस साल नदारत है। हॉ थाना चौक पर थोड़ी सी लकड़ी जला कर फर्ज की इतिश्री कर ली गई है और फाईलों पर यह कइ जगह जल भी रही  है।
ठंड से ठिठुरती हुई ऑख एक कंबल की फरयाद करती हुई शायर की इन पंक्तियों के साथ कहती है ‘‘हर शाम हुई सुबह को एक ख्बाव फरामोश,
 दुनिया यही दुनिया है तो क्या याद रहेगी।’’ 

02 जनवरी 2011

तलाक (चुटकी)

पत्नी पीड़ित पति ने

तलाक का खर्चा पूछा

वकील साहब ने कहा एक हजार

भड़ककर पति महोदय ने कहा

वाह सरकार

शादी में पंडित ने खर्च कराये

कुल रूपये चार

तलाक में आप लेगें एक हजार।

वकील ने तपाक से कहा

बिल्कुल सही कह रहे हो

और

सस्ते काम का परिणाम ही

तो सह रहे हो।

01 जनवरी 2011

नववर्ष की हार्दीक शुभकामनाऐं....


संत कबीर की इन चंद पक्तियों के साथ नववर्ष की मंगलकामनाऐं


कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय।
चाहे कहूं सत आइना, जो जग बैरी होय।।

नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग।
और रसायन छांडि के, नाम रसायन लाग।।

काजल केरी कोठड़ी, तैसा यहु संसार।
बलिहारी ता दास की पैसिर निकसण हार।।

जागो लोगों मत सुवो, ना करूं नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार।।

भेष देख मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान।
बिना कसौटी होत नहीं, कंचन की पहिचान।।

गौरी, एक प्रेम कहानी

गैरी #अरुण साथी गौरी के लव मैरिज का पांचवां साल हुआ है। तीन बच्चों को वह आज अकेले चौका-बर्तन कर संभाल रही है। पति ने छोड़ दिया है। उसी पति ...