16 दिसंबर 2017

गौरी, एक प्रेम कहानी

गैरी

#अरुण साथी

गौरी के लव मैरिज का पांचवां साल हुआ है। तीन बच्चों को वह आज अकेले चौका-बर्तन कर संभाल रही है। पति ने छोड़ दिया है। उसी पति ने छोड़ दिया जिसके लिए गौरी लोक-लाज छोड़ा, माय-बाप छोड़ा, गांव-समाज छोड़ा। उसी पति को पाने के लिए आजकल वह थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगा रही है। इसी चक्कर में उसे आज फिर वकील साहब डांट रहे है।
"जब भतरा मानबे नै करो हउ त काहे ले ओकरा जेल से छोड़ाबे में लगल हीं।"

गौरी के पास जबाब था पर वह सिर्फ बेबस आंखों से वकील साहब को देखने लगी। गौरी की इसी बेबसी को देख हर कोई सहम जाता है। जाने गौरी की आंखों में ऐसा क्या है? पर कुछ तो है गौरी आंखों में। या कहें सबकुछ है। गौरी की बड़ी-बड़ी आँखों में समुंद्र हो जैसे। उसी समुंद्र में ज्वार-भाटे उठ रहे हो जैसे। गौरी की आंखों में प्रेम की एक गहराई भी हो जैसे। गहराई समुंद्र जितनी, जिसका थाह कोई ना ले सका। उसी गहराई में कहीं कोई ज्वालामुखी बसा हो और जो अचानक से, बिना किसी को बताए भयानक आवाज के साथ गड़गड़ाहट कर फट पड़ी हो। लावा चारों तरफ बिखर बिखर गया हो और उसी लावे में समाज, देश, धर्म, जाति सभी भष्म हो गए हों!

वकालतखाने में गौरी के साथ ही उसके तीनों बच्चे सहमे से चिपके हुए थे। गौरी का मन नहीं मानता है। बस यही तो जबाब है। गौरी पुलिस से आरजू मिन्नत कर पति को जेल तो भेजवा दिया पर पति को पुलिस गिरफ्त में देख उसका करेजा कांप गया। उसके आंख से आँसू झरने लगे। वह पति के सामने गयी तो पति भड़क गया। गंदी गंदी गालियां देने लगा।

"केतनो कर पर अब तोरा नै अपनइबउ। जेतना मजा लेबे के हलउ उ ले लेलिऔ। अब हमरो पत्नी हइ, बच्चा हइ। समाज हइ। हम्म बाभन तों शुदरनी। दुन्नु के मेल नै होतै!"

बस इसी बात पे तो गौरी का खून खौलने लगता है। लगता है जैसे कोई उसे ईंट के खलखल करते भठ्ठी में आधा गाड़ दिया हो या ज्वालामुखी का सारा लावा किसी ने उसे पिला दिया हो। उसका देह आग सा धधकने लगता है। वह हुंकार करने लगती है। दर्द भरी हुंकार। जैसे किसी ने उसे नहीं उसके प्रेम को चुनौती दी हो। वह गरजने लगी...

"जखने मजा ले हलहिं तखने शुदरनी नै हलिये। साथ सुत्ते में बाभन नै हलहिं। बियाह करे में मन लगलौ। तीन तीन गो ढेनमा- ढेनिया जन्माबे मन लगलौ। तखने तो कहो हलहिं कि तोर देह चन्दन नियर धमको हउ। अखने गमको हियौ। कोढ़िया! कैफट्टा! भंगलहबा!"

गौरी का गुस्सा फिर सातवें आसमान पे पहुंच गया। वह कांपने लगी।

( नोट- सच्ची घटना पे आधारित एक कहानी।)

शेष अगले क़िस्त में, इंतजार करिये..

चित्र गूगल देवता से साभार

14 दिसंबर 2017

राजसमंद

राजसमंद

एक असुर
हाथ में कुल्हाड़ी ले
काटता है
आदमी को
फिर जला देता है
डालकर पेट्रोल
और बनाता है वीडियो

कई असुर
लगाते है
अट्टहास

गाते है
आसुरी गीत
करते है
आसुरी नृत्य

अरे रुको
झांको तो
अपने अंदर
धर्म ध्वज धारी
कोई असुर
हमारे अंदर भी तो नहीं
मंद मंद मुस्कुरा रहा है...
अरुण साथी/14/12/17

22 नवंबर 2017

सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव
अरुण साथी

पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा पर बहुत हद तक सफलता पाई है। उपाय के तौर पे सबसे पहला काम मोबाइल एप्प को डिलीट किया। ब्राउज़र से कभी कभी उपयोग करता हूँ। गंभीर मामला है, समझें..

6 से 8 घंटे सोशल मीडिया पे.

Quality time, off time माध्यम से जब सोशल मीडिया पे खर्च किये जा रहे समय पे नजर रखी तो पता लगा कि प्रति दिन 6 से 8 घंटे सोशल मीडिया पे खर्च हो रहे है। यह जीवन महत्वपूर्ण और कीमती घंटे थे।

क्या क्या छीना
सोशल मीडिया ने साहित्य, कहानी, कविता पढ़ना-लिखना छीन लिया। ऊपरी तौर पर दो चार लाइनों को पढ़कर काम चलाना सिखा दिया। योग, ध्यान, एकाग्रता छीन ली। जरूरी काम का समय छीन लिया। सोशल समारोहों में धुलना-मिलना छीन लिया। आईये अपने अनुभव से जाने। सुबह उठकर क्या पोस्ट करें यही विचार आता था। कैसे लाइक्स और कमेंट मिले इसका जुगाड़ हमेशा मन मे घूमता रहे।

सकारात्मक सोशल मीडिया

सोशल मीडिया को हम दो भागों में बांट सकते है। सकारात्मक। नकारात्मक। सकारात्मकता की बात करें तो सोशल मीडिया ने एक ग्रामीण व्यक्ति को बड़ी पहचान दी। इसकी शुरुआत अपनी कहानी "एक छोटी सी लव स्टोरी" से हुई। पुराने दोस्त जानते है। इस कहानी में मैंने अपने जीवन का पन्ना पन्ना खोल दिया। अपनी गरीबी, प्रेम कहानी, पिता की स्तित्व..सब कुछ..!
धीरे धीरे बहुत से मित्र और अभिभावक मिले।

सीना उस दिन चौड़ा हो गया जब बरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार अरुण अशेष जी ने कॉल कर कहानी को रेणु जी के बाद उसी स्वाद में लिखी गयी रचना बताया। देश-विदेश में कई मित्र (अजीज) बने। सकारात्मक सोंच बना। नई पहचान बनी। नई ऊर्जा मिली।

नकारात्मक सोशल मीडिया

2014 के आसपास सोशल मीडिया का ट्रेंड बदला। धर्म के नाम पे आक्रामकता बढ़ी। जाति और समाज के रूप में सोशल मीडिया बंटा। मैं भी इसमें फंस गया। केजरीवाल और अन्ना आंदोलन में। केजरीवाल ने सोशल मीडिया के सहारे राजनीति की और सफलता स्वरुप दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। बंटते-बंटते देश स्तर पे सेकुलर और कॉम्युनल, हिन्दू, मुसलमान में बंट गया। कॉम्युनल हावी हुए। सेकुलर शब्द गाली हो गया। इतिहास बदले जाने लगे। अफवाह फैलाई जाने लगी। और फिर यही बदलाव स्थानीय स्तर पे पहुंच गई। #WhatsApp कूड़ेदान बना। इतिहास और धर्म को प्रोपगंडा बनाकर परोसा जाने लगा।

सोशल मीडिया पे गुंडे

पहले गांव-घर मे गुंडे होते थे। वही गुंडे अब सोशल मीडिया पे है। शराब कारोबारी, ठग, राहजनी करने वाले, बैंक लूटने वाले, बलात्कारी, अपहरणकर्ता, हत्यारे, सब है। इसके फ्लॉवर भी है। जैसा कि समाज में रहा है। नकारात्मक के समर्थक ज्यादा रहे है। यहां भी है। गांव में एक कहावत है। "तों छिनार तब तों तीन छिनार!" अर्थात यदि किसी गलत को गलत कहे तो वह आपको बड़ा गलत साबित करने के झूठे तर्क देगा।

जैसे कि एक ग्रुप से नकारात्मक लोगों को निकालना मुझे भारी पड़ा। वे इसे पर्सनल ईगो बना कर मेरे विरोधी बन बैठे। घरेलू विवाद पे एक गोतिया प्रोपगंडा करने लगा। फेसबुक पे बदनाम कर दबाब बनाने लगा। फेसबुक पे दुष्प्रचार। शराब बेचने, ठगी करने अथवा छात्राओं से छेड़छाड़ करने वाले कि खबर छापना मुसीबत मोल लेना हुआ। वे अब सोशल मीडिया पे गाली गलौज करने लगे। इसको सह राजनीतिक गुंडे भी देने लगे। उनके इशारों पे नहीं नाचना भारी पड़ा।
   खैर, इन सबसे नकारात्मकता बढ़ी। तनाव बढ़ा। डिप्रेसन हुआ।

मिली धमकी

पिछले दिनों शराब के साथ गिरफ्तार एक युवक और गुंडा गिरोह के राहजनी, कोचिंग, स्कूल जाती लड़कियों से छेड़छाड़ की खबर बनाना भारी पड़ा। वे युवक गाली गलौज करने लगे। पहले इग्नोर किया। फिर प्रथमिकी दर्ज करा दी। उसीने कॉल कर के धमकी दी। खुद को आतंकवादी बताया। वह खुलेआम सुपारी लेने की बात फेसबुक पे लिखता है।

फिर जग्गा
जासूस ने एक पेज बनाया। शायद कोई दुश्मन दोस्त है। पनशाला खोलने को लेकर नकारात्मक बातें की। उसे समर्थन मिला। पत्रकारिता की आलोचना की। बाजिव लगा। पर नासमझी भी। उसे नहीं पता ही मैं एक रिपोर्टर हूँ। मेरा भेजा हर समाचार प्रकाशित नहीं होता। फिर उसने चरित्र हनन शरू की। कई लोगों का। उसके फ्लॉवर बढ़े। फ्लॉवर अपने मित्र मंडली से भी। समाज के बौद्धिक लोग भी। फिर देखा देखा पेज बना कर चरित्र हनन शुरू हुआ। राजनीतिक प्रतिद्वंदी एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में सोशल मीडिया को गंदा किया। यह सब स्थानीय स्तर पे हुआ।

सोशल मीडिया को मैनेज किया

फिर उपरोक्त समस्या से छुटकारे का उपाय खोजा। मिल भी गया। फेसबुक व्हाट्सएप का उपयोग बहुत कम किया। या एक निश्चित समय में कर दिया। राजनीतिक पोस्ट बंद किया। धार्मिक पोस्ट से जितना बच सकूं, बच रहा हूँ। परिणाम सकारात्मक आये। रिलैक्स हूँ। आप सब भी मैनेज कीजिये। सोशल मीडिया के उपयोग के घंटे तय कीजिए। 24 घंटे कितना खर्च करना है। दो से तीन बहुत है। उसका समय निर्धारित कीजिये।

मोबाइल एप्प सबसे बड़ा ग्रह

मोबाइल एप्प से बचिए। स्मार्ट मोबाइल  को कम से कम अपने पास रखिए। कंप्यूटर है तो उसपे उपयोग करिये। नहीं तो मोबाइल ब्राउजर में। एप्प से नहीं। कठिनाई हो। तभी कम होगा। यूट्यूब से बचिए। एडिक्शन से छुटकारा लीजिये। यह जहर है। समाज को अनसोशल बना रहा है।

कुछ जरूरी पॉइंट्स

1- समय निर्धारित कीजिये।
2- शरीरिक रूप से मित्रों से मिलिए।
3- नकारात्मक बातों से बचिए।
4- नोटिफिकेशन बंद रखे।
5- off time , quality time एप्प का उपयोग कीजिये। यह आपको मोबाइल यूज़ करने से रोक देगा।

17 नवंबर 2017

रातो रात अरबपति हुआ बासुदेव

रातों-रात अरबपति हुआ बासुदेव यादव

शेखपुरा (अरुण साथी)

जी हां शेखपुरा जिले के घाटकुसुंबा निवासी वासुदेव यादव रातों-रात अरबपति हो गया। यह कोई कहानी नहीं बिल्कुल हकीकत है। वासुदेव यादव के खाते में 999567070 रुपए जमा हो गए। 25000 वेतन पाने वाले वासुदेव एक राजस्व कर्मचारी के रूप पर तैनात हैं और उनके खाते में इतना रुपया रातोरात स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की गलती से आ गया। यह गलती स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सिकंदरा शाखा (जमुई) से की गई है।

इस संबंध में राजस्व कर्मचारी वासुदेव यादव ने बताया कि उनको जब इस बात की जानकारी मिली के उनके खाते पर 99 करोड़ रुपए आ गए हैं तो उनकी उनको बहुत परेशानी हुई और शाखा प्रबंधक से मिलकर इस की छानबीन की तो पता चला के सिकंदरा (जमुई जिला) के शाखा से यह रुपया उनके खाते पर जमा हो गया है। उसी शाखा में उनका खाता भी है। बाद में सिकंदरा शाखा के प्रबंधक से संपर्क कर यह पैसा लौटा दिया गया तब जाकर उनको राहत महसूस हुई।

05 नवंबर 2017

बिहार- निजी क्षेत्र में आरक्षण

#आरक्षण और #सवर्ण

बीजेपी और जदयू की सरकार ने बिहार में प्राइबेट नौकरियों (आउटसोर्सिंग) में भी आरक्षण देकर एक बार फिर वोट बैंक का दांव खेल दिया है। सोशल मीडिया के भौकाल सवर्ण भक्त हक्का-बक्का है। पांच-सात हजार की नौकरी जैसे तैसे मिली अब उसपे भी आफत! उनको लगता है कि एक भी (ठाकुर जी को छोड़) सवर्ण नेता आवाज क्यों नहीं उठा रहा।

वे यह नहीं सोंचते कि सवर्ण समाज किसी को आज नेता ही नहीं मानता। फिर कोई क्यों आवाज उठाएगा। जिससे भी मिलिए कहेगा, इस समाज का नेता कौन है? नेता से मिलिए तो कहेगा सवर्ण किसको नेता मानता है?  यह दुर्भाग्य उस समाज का है जिसने स्वामी सहजानंद सरस्वती, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, वीर कुंवर सिंह, डॉ श्री कृष्ण सिंह सरीखे महामानव दिए।

सवाल यही सबसे बड़ा है कि सवर्ण आज धोबी का पशु बन गया है। न घर का। न घाट का। चार जातियों का यह समाज चारो चार तरफ..और तो और सबसे ज्यादा डापोरशंख भूमिहार समाज। बजना ज्यादा, करना कम। चुनाव में भौकाल हो जाएगा। मुद्दे से हटकर भावनाओं को तरजीह देगा। जितना आदमी उतना नेता।

अंत मे जो समाज अपने हित की रक्षा नहीं कर सकता उसकी रक्षा भगवान भी नहीं करेंगे। निजी क्षेत्र में आरक्षण एक जहर है। जो इस समाज को दिया गया है। पहले से ही सरकारी आरक्षण की मार झेल रहा समाज मरेगा। बिकल्प नहीं बचने दिया जाएगा। कारण वही की समाज किसी को नेता नहीं मानेगा। हार्दिक पटेल सिर्फ गुजरात मे ही क्यों हुआ, बिहार में नहीं हो सकता..! कारण के लिए हमें सबसे पहले अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है..हम सब के सब नेता है...दो एक लोग बोलेंगे। हम उपहास उड़ाएंगे।

बाकी तो सोशल मीडिया भड़ास निकाले के जगह हैइये हो, करते रहो भचर-भचर...जय #भौकाल...

26 अक्तूबर 2017

डूबते हुए को पहले नमन करता है भारत

डूबते हुए को पहले नमन
अरुण साथी
भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कार की यही पहचान है और इसी पहचान का उद्घोष है आस्था का महापर्व छठ के अवसर पर डूबते हुए सूरज को सबसे पहले नमन करना। भारतीय संस्कृति की झलक इतिहास में झांकने से भी नजर आएगी जब इतिहास पुरुष दबे कुचले और कमजोरों की मदद करने के लिए सबसे पहले आगे आते हैं।

यह हमारा संस्कार है और इसी उद्घोष के साथ छठ पर्व पर हम सबसे पहले डूबते हुए सूरज को अर्घ देते हैं। साथ ही साथ उसी समय हम यह भी संदेश देते हैं कि जो डूब रहा है उसका भी उदय होगा। आज संध्या अगर कोई गिर पड़ा है, कोई डूब रहा है तो कल सुबह वह फिर उठेगा फिर उसका उदय होगा और फिर हम जिसका उसको भी नमन करते हैं। हम उस को नमन करते हैं जो डूबने के बाद आज सुबह फिर से निकल पड़ा है अपनी अनंत यात्रा पर। उस यात्रा पर भी जिसमें कल डूब जाना भी सुनिश्चित है। यह उस की यात्रा का भी संदेश है कि जैसे ही हम उगते हैं तो धीरे-धीरे प्रयास करते हुए हम संसार में अपनी रौशनी बिखेर दें। वह संसार हमारा लघु भी हो सकता है और बृहत भी हो सकता है। एक सूरज जो आसमान पर छा कर पूरे ब्रम्हांड को रैशन करता है तो दूसरा सूर्य हम भी बन सकते हैं और अपने आसपास लघुता में ही सही थोड़ी सी रौशनी बिखेर सकते हैं।

हालांकि उसी सूर्य की तरह शाम होने की भी सुनिश्चितता है परंतु उसी शाम की तरह फिर से सुबह होने की सुनिश्चितता लिए हम चलते रहें और दुनिया में रौशनी बिखेरते रहे। आस्था के इस महापर्व छठ का एक मौलिक संदेश है।

08 अक्तूबर 2017

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

अरुण साथी

ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। वह एक हिंदू होकर ताजिया को कांधा दे रहा है इस बात से उसे कोई लेना-देना नहीं है। उसका धर्म बस दो पैसा कमा लेना है जिससे उसके बाल-बच्चे को रोटी मिल सके। उसके साथ दो दर्जन मांझी युवक यही कर रहे थे। यही युवक देवी दुर्गा की भारी-भरकम प्रतिमा को भी कंधे पर उठाकर रात-रात भर जागकर नगर में घुमाते रहें है। आज जब हम धर्म के नाम पर मार-कुटाई कर रहे हैं और नफरत की इतनी बड़ी खाई बना दी गई है कि कोई गांधी भी आकर उसे अब पाट नहीं सकता तब बबलू मांझी जैसे युवकों से ही हमें सीख लेनी चाहिए, उसका धर्म उसकी रोटी है। रोजगार है। भूख है। विकास है।

कितनी नफरत है चारो तरफ

बात अगर धार्मिक नफरत की करें तो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक बड़ी सी दीवार नजर आती है। यह आग नेताओं द्वारा हमेशा से लगाई जाती रही है पर अब इस आग में घी का काम सोशल मीडिया कर रही है। साथ साथ चौथाखंभा भी यही कर रही। अब चैनल छाती ठोक से पार्टी के समर्थक होने का दावा कर रहे। हमारी राजनीतिक आस्था का पता भी अब इससे चलता है कि हम #ज़ी_न्यूज़ देखते है की #एनडीटीवी! कट्टरपंथी हिंदू से अगर बात करें तो उनके लिए मुसलमानों का बच्चा बच्चा आतंकवादी है! मदरसों में पढ़ाई जाने वाली धार्मिक कट्टरता आतंकवादी पैदा कर रहे हैं! उनका तर्क होता है कि दुनिया भर में आतंक फैलाने वाला हर एक आदमी मुसलमान क्यों है! मुसलमान भारत को अपना देश नहीं मानते! वे दुश्मन देश पाकिस्तान को अपना मानते है!

उधर मुसलमानों से अगर बात की जाए तो उनके लिए देश से बड़ा धर्म है! इंसानियत से बड़ा शरीयत है! वे कहते हैं कि बंदेमातरम् क्यों कहूं? वे कहते हैं कि दुर्भाग्य से नरेंद्र मोदी देश का प्रधानमंत्री है? आज भी वह इसे स्वीकार नहीं कर रहे! तीन तलाक, बाल काटने पे फतवा जैसे मशलों पे तथाकथित क्रांतिकारी, उदारवादी लोग भी चुप्पी साध लेते है। और गौ रक्षक, लव जेहाद, असहिष्णुता, लिनचिंग जैसे मुद्दे पे उनकी उदारता प्रखर हो उठती है!

आग ही आग
बिहार में दुर्गा पूजा और मोहर्रम में मचा हंगामा अभी नहीं थमा है। नवादा में हंगामा इस लिए मच गया कि कुछ युवक नारा लगा रहे थे "भारत में रहना है तो वन्दे मातरम कहना होगा।" और फिर ताजिया जुलूस में कहीं पाकिस्तानी झंडे और टी शर्ट पहन कर निकले तो कहीं पाकिस्तान जिन्दावाद का नारा लगाया! क्रिकेट मैच हो या अन्य मुद्दे पाक का समर्थन करते है...

दूसरी तरफ गौ रक्षा के नाम पे लंपट गैंग आदमी की सरेआम हत्या कर रहे हैं जबकि वही गैंग तब चुप रहता है जब बूढ़ी, बीमार गाय हो हिन्दू ही कसाई के हाथों बेच देता है। पशु बाजार जाकर देखिये तब समझ आएगा की हिन्दू का गौ प्रेम कितना है!
हद तो यह कि ये गैंग तब भी चुप रहता है जब गौशाला में 700 से अधिक गाय खाना के अभाव में मर जाती है। तब चुप रहता है जब उनकी प्यारी सरकार गौशाला के लिए कुछ नहीं करते..!

गांधी का अपमान
व्हाट्सएप ग्रुप में यदि देखें तो हिन्दू शब्द वाले ग्रुप में ऐसे ऐसे अफवाह रहेंगे की लगेगा देश नहीं बचेगा। अभी हाल भी में एक मित्र के ग्रुप को देख रहा था। गांधी जयंती पे गांधी जी को इतनी गालियां दी गयी कि कहा नहीं जा सकता और ग्रुप में किसी ने विरोध नहीं किया। इसी तरह मुसलमानों के ग्रुप में भी नरेंद्र मोदी को लेकर देखा जा सकता है!

वोट बैंक में बदल जाना

नफरत की राजनीति करने वालों के लिए यह सुखद समय है। आज जनहित की राजनीति करने वाले विलुप्त हो गए है और जहर उगलने वालों का जयकार है। निश्चित रूप से इससे कभी देश का भला नहीं हो सकता। आज मुसलमानों के आर्थिक पिछड़ापन, गरीबी को देखें तो यह बात समझ मे आ जायेगी की मुसलमानों के हितैषी पार्टियों ने उनके लिए क्या किया? बस एक वोट बैंक बन कर रह गए। हद तो यह कि यह बात मुसलमानों को आज तक समझ नहीं आयी। आश्चर्य है कि मुस्लिम हितैषी पार्टियों ने हलखोर जैसे गरीब मुसलमानों को दलित का दर्जा नहीं दिया, बस नारा दिया।

आज वही स्थिति हिंदुओं की है। हिन्दू आज वोट बैंक में बदल गए हैं। वे कहते है रोटी, रोजगार, विकास, अपराध, अपमान, बेटी सुरक्षा की बातें मत करो, धर्म की बातें करो। वही हम कर रहे। एक स्वास्थ्य समाज, संस्कृति और प्रगतिशील लोकतंत्र के लिए धर्म और जाति का वोट बैंक में बदल जाना उतना ही खतरनाक है जितना जहर पीना..! तुष्टीकरण ने न मुसलमानों का भला किया न हिन्दुओं का करेगा..बस..बहुत लंबा हो गया..

02 अक्तूबर 2017

*अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस*

*अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस*

साहब बहुत गरम है, कह रहे हैं कि गंधी जी को मार तो दिया पर वह मर काहे नहीं रहिस है। अगल-बगल में चेले चपाटी भी थे। वे लोग भी साहिब के गुस्से को देखकर मुंह लटका लिए। जयंती के दिन वैसे भी मुंह लटका ही लेना चाहिए। चेले चपाटी को यही लगा। पर साहेब का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा। तभी उधर से हमारे मघ्घड़ चा भी आ पहुंचे।

"का कहते हो मर्दे। हेतना उपाध्याय, मुखर्जी सबको लगा दियो तब भी गंधी महत्मा नहीं मर रहिस...घोर कलयुग..काहे नहीं, हे राम-काम तमाम वाले दिन को अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस धोषित कर देते हो। एकरा में मसूदी, बगदीदी जैसे क्रांतिकारी का भी समर्थन मिल ही जायेगा....ठोका-ठाकी पार्टी वाला सब साथ आ ही जायेगा..।"


चा का ई सुझाव साहिब को जांच गया। तब से अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता उन्मूलन दिवस की घोषणा हो गयी। मघ्घड़ चा सुनहरे सपनों में खोकर योजना बना लिए। उस दिन सोशल मीडिया पे सेकुलर कुत्ते जैसे अनमोल प्रवचन की भरमार रहेगी...

मजाल है कि चूं कर ले..ऐसा ऐसा बीएचयू और जेएनयू टाइप फार्मूला निकालेंगे की सेकेंड नहीं लगेगा देशद्रोही साबित करे में..वैसे भी इतने सालों तक ई खांग्रेसी देशद्रोही, भ्रष्टाचारी ही शासन करते रहे है. ई वामी कीड़े तो रजिस्टर्ड देशद्रोही है..गरीब के नाम पे लूट करे वाला...

तभी जुम्मन आ कर पूछने लगा "साहिब हुजूर। गोबर बहुते जमा हो गया है। उसको दीवार पे थापे की नहीं। का आदेश है। कहीं रक्षक जी महाराज आकर मार कुटाई न कर दें...."

जे हिन... जे भारत...

29 सितंबर 2017

धर्म के नाम पे जीव हत्या कैसे उचित?

धर्म के नाम पे जीव हत्या कैसे उचित?

ईश्वर के नाम पर उनकी ही संतानों को मार देना कहीं से भी ईश्वर को प्रसन्न करने की बात नहीं हो सकती। एक तरफ हमारे सभी धर्म ग्रंथ कहते हैं कि सारे जीव जंतु ईश्वर की संतान हैं तो फिर कैसे अपने ही संतान की बलि लेकर कोई प्रसन्न हो सकता है! हालांकि धर्मों के आधार पर हमारी सोच और मान्यताएं बदल जाती है। कुछ दिन पहले कुर्बानी पर पशु प्रेम हमारा जागृत हो गया था, परंतु आज वही सन्नाटा है।

हालांकि स्थिति बहुत ही नकारात्मक नहीं है। जैसे जैसे हम जागरुक हो रहे हैं बलि प्रथा का विरोध कर रहे हैं। कई गांवों में बलि के रूप में भुआ नामक फल को काटा जाता है जो कि एक सकारात्मक पहल है। सभी जागरुक लोगों को इसके लिए आगे आना चाहिए। हमारे विद्वान धर्माचार्य अपने किसी भी ग्रंथ में बलि प्रथा का समर्थन नहीं होने की बात कही है। धर्म को इस तरह से विकृत कर हम खुद ही आधार्मिक हो जाते हैं। आइए बलि प्रथा का विरोध करें। इसे मांसाहार से न जोड़े, यह एक अलग विषय है।।

22 सितंबर 2017

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे
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एक महीने के भीतर फिर एक पत्रकार मारा गया है. इस बार बुरी खबर आई है त्रिपुरा के कम्युनिस्ट राज से. त्रिपुरा के लोकल चैनल 'दिनरात' मे काम करने वाले शांतनु भौमिक पर चाकू से हमला हुआ. उन्हें अगरतला अस्पताल ले जाया गया. जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
पुलिस के मुताबिक शांतनु पश्चिमी त्रिपुरा में इंडिजीनस फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और सीपीएम के ट्राइबल विंग टीआरयूजीपी के बीच संघर्ष को कवर कर रहे थे. उसी दौरान उनका अपहरण कर लिया गया था. महज 24 साल के इस युवा पत्रकार को चाकुओं से गोदकर और पीटकर मार डाया गया. जिस राज्य में मारा गया, वो सीपीएम शासित है. माणिक सरकार मुख्यमंत्री हैं.
हाल के दिनों में पत्रकारों पर हमले की कई घटनाएं हुई हैं. ताजा मामला बेंगुलुरु में गौरी लंकेश की हत्या का था. अब उसी कड़ी में त्रिपुरा से एक नाम और जुड़ गया है. इसी बहाने गौरी लंकेश की मौत पर जश्न मनाने वाले ट्रोल टाइप लोगों को भी मौक़ा मिल गया है
लंकेश की हत्या के विरोध में लामबंद होने वाले वामपंथी नेताओं और वामपंथी विचारधारा वाले पत्रकारों-लेखकों से लेकर उन तमाम पत्रकारों या अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधरों से सोशल मीडिया पर सवाल पूछे जाने लगे हैं कि गौरी लंकेश पर बोले तो अब क्यों नहीं बोल रहे हो? गौरी लंकेश की हत्या पर प्रेस क्लब में जमा हुए तो अब क्यों नहीं हो रहे हो? गौरी लंकेश की हत्या पर बेंगलुरु में प्रर्दशन कर रहे थे तो अब अगरतला में क्यों नहीं कर रहे हो ...? गौरी लंकेश के खिलाफ जुटी आवाजें अब कहां गुम हैं ?
बहुत हद तक ये सवाल जायज भी हैं. ऐसे सवाल पूछे भी जाने चाहिए कि गौरी की हत्या पर उतना हंगामा तो शांतनु की हत्या पर इतना सन्नाटा क्यों? प्रेस क्लब ऑफ इंडिया या बाकी संगठन को इस हत्या के खिलाफ कड़े स्वर में विरोध दर्ज करना चाहिए. मान कर चल रहा हूं कि कराएंगे भी. सवाल तो ये भी है कि सोशल मीडिया के सिपाहियों और कर्मठ कार्यकर्ताओं को इतनी जल्दबाजी क्यों हो गई? शांतनु भौमिक की हत्या के विरोध के बहाने गौरी लंकेश की हत्या के बाद एकजुट होने वालों को घेरने की मुहिम क्यों चल पड़ी? इनका गुस्सा शांतनु की हत्या के खिलाफ है या गौरी लंकेश के पक्षधरों के खिलाफ? इन सवालों के जवाब में ही बहुत कुछ छिपा है.
बात सवाल पूछने वालों पर भी होनी चाहिए और मौन साधने वालों पर भी. दोनों सेलेक्टिव हैं. दोनों अपनी धारा के माकूल विषय देखकर ही बोलते और मौन साधते हैं. जो मौन साधता है, उसे दूसरा आकर कोंचता है कि तुम चुप क्यों हो? बोलते क्यों नहीं? और जो बोलता है, उसे भी पहला आकर पूछता है कि तब तुम कहां थे...तब तुम चुप क्यों थे? दोनों 'तब तुम कहां थे' के सिंड्रोम से ग्रसित हैं .
खास बात ये है कि त्रिपुरा के पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या पर खुद शोक संतप्त होकर गौरी लंकेश की हत्या पर शोक मनाने वालों को घेरने वालों में वो लोग भी हैं, जो गौरी लंकेश को गोलियों से छलनी किए जाने के चंद घंटों के भीतर उन्हें पूतना, कुतिया, रावण की बहन-बेटी घोषित करके जश्न मना रहे थे. गौरी की हत्या को पूतना वध कह रहे थे. गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें डायन, चुड़ैल, संपोली...न जाने क्या-क्या कहा गया.
उनके पुराने लेखों और विचारों को सोशल मीडिया पर शेयर करके उनकी हत्या को सही साबित करने की कोशिश खुलेआम की गई. कई दिनों तक सोशल मीडिया पर गौरी की हत्या के खिलाफ बोलने वाले को हर तरह से घेरा गया. ऐसा माहौल बना दिया गया कि गौरी का मारा जाना किसी भी तरह से गुनाह नहीं. बल्कि गुनाह वो कर रही थीं, जिसकी किसी ने उन्हें सजा दे भी दी तो हाय तौबा नहीं मचनी चाहिए.
त्रिपुरा में पत्रकार शांतनु की हत्या की निंदा भी होनी चाहिए और त्रिपुरा सरकार की लानत-मलामत भी. गौरी लंकेश की हत्या पर एकजुट हुए वामपंथी नेताओं को भी जवाब देना चाहिए कि जब उनके सूबे में पत्रकार सुरक्षित नहीं तो वो किस मुंह से गौरी लंकेश की हत्या पर मातम मनाने के जुलूस में शामिल हुए थे? अगर तब चीख रहे थे तो अब भी चीखिए और कहिए कि आपके राज ये कैसे हुआ? पत्रकारों की सुरक्षा में अपनी सरकार और तंत्र की नाकामी का जवाब दीजिए.हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचाकर कबूल करिए कि ये आपकी नाकामी थी.
यकीनन वामपंथी जमात को भी त्रिपुरा के इस पत्रकार के कत्ल की निंदा भी उसी तेवर के साथ करनी चाहिए. प्रेस क्लब में पत्रकारों की सभा में मंचासीन वामपंथी नेताओं ने तब गौरी लंकेश की हत्या पर जितनी चिंता जताई थी, वो सारी चिंताएं तभी मायने रखेंगी, जब कन्हैया कुमार से लेकर डी राजा, सीताराम येचुरी उसी अंदाज में, उसी तेवर के साथ वामपंथ शासित सूबे में एक पत्रकार की हत्या पर चिंता जताएं. विरोध दर्ज कराएं.
किसी भी पत्रकार या लेखक की हत्या को सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी/प्रेस की आजादी पर हमला मान कर मैं नहीं देखता. मेरा मानना है कि विचार का मुकाबला विचार से हो, चाकू और गोलियों से नहीं. तब तक जब तक वो विचार या विचारधारा वाला व्यक्ति देश/समाज के लिए बड़ा खतरा न बन जाए. अगर कोई ऐसा खतरा बनता है तो उसे रास्ते पर लाने /सबक सिखाने/सलाखों के भेजने /कानून की गिरफ्त में पहुंचाने के कई तरीके हैं. जो सभ्य समाज के तरीके हैं. किसी भी सूरत में गौरी की हत्या को जस्टीफाई नहीं किया जा सकता और जो जस्टीफाई करते रहे हैं वो शांतनु भौमिक की हत्या के विरोध का मुखौटा लगाकर घेराबंदी का माहौल बना रहे हैं.
गौरी की हत्या के पीछे कौन लोग थे ? क्या उनके लेखन की वजह से उन्हें मारा गया ? क्या उनकी विचारधारा से चिढ़े किसी कट्टरपंथी ने उनकी हत्या कर दी ? इसका खुलासा होना अभी बाकी है. हो सकता है कि इसमें लंबा वक्त लगे. हो सकता है कि गौरी लंकेश के हत्यारे पकड़े भी न जाएं. जैसे कलबुर्गी और पनसारे की हत्या के बहुत से तार आज तक नहीं जुड़ पाए. गौरी की हत्या के बाद कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता गौरी लंकेश को बचा न पाने वाली अपनी सरकार पर शर्मिंदा होने की बजाय पीएम मोदी को घेरने में जुट गए. उनका हित इसी में सधता दिखा.
अगर गौरी लंकेश पर कोई खतरा था तो उनकी हिफाजत की जिम्मेदारी कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की थी. तो प्रेस क्लब में गौरी लंकेश की हत्या पर बुलाई गई पत्रकारों की सभा में कांग्रेस नेता शोभा ओझा के आने या बुलाने का कोई औचित्य नहीं था. अगर वो बिन बुलाए आ भी गईं तो उन्हें माइक थाम कर गौरी की हत्या शोक व्यक्त करने से पहले अपनी शर्मिंदगी और नाकामी का इजहार करते हुए कबूल करना चाहिए था कि गौरी को न बचा पाने के लिए उनकी सरकार ज़िम्मेदार है
वामपंथी नेता भी खूब बोले. तब उन्हें बोलना मुफीद लग रहा था. अब वो बोलने से पहले सोच रहे होंगे. जो तब या तो चुप थे या गौरी के लेखकीय गुनाह पर रिसर्च करके चाहे-अनचाहे उनकी हत्या को सही ठहरा रहे थे, वो अब बुरी तरह से सक्रिय हैं. जैसे इस बार उनकी बारी हो.
इन सबके के बीच बड़ा सवाल है पत्रकारों की सुरक्षा का. देश के हर हिस्से में पत्रकारों पर हमले होते रहे हैं. सीवान में राजदेव रंजन से लेकर यूपी के शाहजहांपुर तक से ऐसी खबरें सुर्खियां तो बनीं लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा के मुद्दे पर सरकारों की तरफ से कोई पहल नहीं होती दिख रही है. जरूरत इस बात की है. असल मुद्दा ये है. पत्रकार चाहे बेंगलुरु की गौरी लंकेश हों या त्रिपुरा का शांतनु भौमिक. विरोध और एकजुटता दोनों के पक्ष में हो, इसमें कोई शक नहीं.
जिन-जिन पत्रकारों ने गौरी की हत्या के विरोध में कुछ लिखा या सोशल मीडिया में इस जघन्य हत्या के खिलाफ आवाज उठाई, उन्हें शांतनु की हत्या के बहाने ट्रोल किया जा रहा है. प्रेस्टीच्यूट /दलाल / बिकाऊ और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है. कोई शक नहीं कि ऐसा बहुत बड़ा तबका है इस देश में, जिसके हर विरोध और विमर्श की बुनियाद मोदी विरोध पर टिकी है.
सही या गलत, मायने नहीं रखता. इसका मतलब ये नहीं कि आलोचना की हर आवाज बिकी हुई है. असहमति की हर आवाज को प्रेस्टीच्यूट कह दिया जाए. हम गौरी लंकेश की मौत पर मातम मना रहे थे. शांतनु की मौत पर भी मातम मनाएंगे. कितना मनाएं. कब मनाएं. कहां मनाएं. ये पैमाना तय करने का हक उन्हें नहीं, जो किसी की हत्या को भी सही ठहराने की दलीलें देते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम के फेसबुक से साभार 

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