20 अगस्त 2017

ओशो के विचार: सुखी रहने के सफल मंत्र


ओशो के विचार, सुखी रहने का सफल मंत्र
**
दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दअसल, तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज सक्रिय हो जाती है। ध्यान सबसे बड़ी कुंजी है।

दुख को त्यागो। लगता है कि तुम दुख में मजा लेने वाले हो, तुम्हें कष्ट से प्रेम है। दुख से लगाव होना एक रोग है, यह विकृत प्रवृत्ति है, यह विक्षिप्तता है। यह प्राकृतिक नहीं है, यह बदसूरत है।

पर मुश्किल यह है कि सिखाया यही गया है। एक बात याद रखो कि मानवता पर रोग हावी रहा है, निरोग्य नहीं और इसका भी एक कारण है। असल में स्वस्थ व्यक्ति जिंदगी का मजा लेने में इतना व्यस्त रहता है कि वह दूसरों पर हावी होने की फिक्र ही नहीं करता।

अस्वस्थ व्यक्ति मजा ले ही नहीं सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है। जो गीत गा सकता है, जो नाच सकता है, वह नाचेगा और गाएगा, वह सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा। लेकिन जो नाच नहीं सकता, जो विकलांग है, जिसे लकवा मार गया है, वह कोने में पड़ा रहेगा और योजनाएँ बनाएगा कि दूसरों पर कैसे हावी हुआ जाए। वह कुटिल बन जाएगा। जो रचनाशील है, वह रचेगा। जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है।

जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं। वे हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं। वे राजनेता बन जाते हैं। वे पुरोहित बन जाते हैं। और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरो को भी नहीं करने दे सकते। इसलिए वे हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं।

जरा इसके पीछे का कारण देखो। अगर वह खुद जिंदगी का मजा नहीं ले सकता तो वह कम से कम तुम्हारे मजे में जहर तो घोल ही सकता है। इसीलिए सभी तरह के विकलांग एक जगह जमा होकर अपनी बुद्धि लगाते हैं ताकि जोरदार नैतिकता का ढाँचा खड़ा कर सकें और फिर उसके आधार पर हर चीज की भर्त्सना कर सकें। बस कुछ न कुछ नकारात्मक खोज निकालना है, वह तुम्हें मिल ही जाएगा, क्योंकि वह तो समस्त सकारात्मकता के अंग के रूप में होता ही है।

जब तुम प्रेम करते हो, तो नफरत भी कर सकते हो। जो व्यक्ति नपुंसक है और प्रेम नहीं कर सकता, वह हमेशा नकारात्मक पर ही जोर देगा। वह हमेशा नकारात्मक को ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करेगा। वह हमेशा तुमसे कहेगा- अगर तुम प्रेम में पड़े तो दुख उठाओगे। तुम जाल में फँस जाओगे, तुम्हें तकलीफें भोगनी होंगी। और, स्वाभाविक रूप से जब भी घृणा के क्षण आएँगे और तुम दुख का सामना करोगे तो तुम्हें वह व्यक्ति याद आएगा कि वह सही कहता था।
***
फिर, घृणा के क्षण तो आने ही हैं। फिर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य रोगों के प्रति ज्यादा सचेत होता है न कि स्वास्थ्य के प्रति। जब स्वस्थ होते हो तो तुम अपने शरीर के बारे में भूल जाते हो। लेकिन, जैसे ही सिर दर्द होता है या और कोई दर्द, या फिर पेट का दर्द तो देह को नहीं भूल पाते। देह होती है तब, प्रमुखता से होती है, बड़े जोर से होती है, वह तुम्हारा दरवाजा खटखटाती है। वह तुम्हारा ध्यान खींचती है।

जब तुम प्रेम में होते हो और खुश होते हो तो भूल जाते हो। लेकिन, जब संघर्ष, नफरत और गुस्सा होता है तो तुम उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगते हो। ऊपर से वे विकलांग लोग, वे नैतिकतावादी, वे पुरोहित, वे राजनेता, वे मिल कर चिल्लाते हैं एक स्वर से कि देखो, हमने तुमसे पहले ही कहा था, और तुमने हमारी नहीं सुनी। प्रेम को त्यागो। प्रेम दुख बनाता है। इसे त्यागो, उसे त्यागो, जीवन को त्यागो। इन बातों को अगर बार-बार दोहराया जाता रहता है तो उनका असर होने लगता है। लोग उनके सम्मोहन में फँस जाते हैं।
***
तुम कहते हो कि तुम उपवास करते रहे हो, तुमने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया है। उपवास का भला बुद्धत्व से क्या ताल्लुक हो सकता है? ब्रह्मचर्य का बुद्धत्व से कोई संबंध नहीं हो सकता? बेतुकी बात है। जो भी तुम करते हो जैसे कि तुम कहते हो कि मैं बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए रात-रात भर जागता रहता हूँ। दिन में बुद्धत्व प्राप्त करने की कोशिश क्यों नहीं करते? रात भर जागने की क्या जरूरत है? ये कुदरत के विरोध में तुम कयों खड़े हुए हो?

बुद्धत्व प्रकृति के खिलाफ नहीं होता। वह प्रकृति की परितृप्ति है। वह तो प्रकृति की चरम अभिव्यक्ति है। वह तो जितना संभव हो सकता है, उतनी प्रकृति है। प्रकृति के खिलाफ होने पर नहीं, बल्कि साथ होने पर ही तुम बुद्धत्व तक पहुँचते हो। वह बहाव के खिलाफ तैरने से नहीं, बल्कि उसके साथ बहने से मिलता है। नदी की यात्रा तो पहले से ही समुद्र की तरफ है। तुम्हें उसके खिलाफ तैरना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं, जबकि तुम करते यही रहे हो।

अब तुम पूछोगे कि तो मुझे क्या करना चाहिए? मैं कहूँगा कि दुख के प्रति अपनी आसक्ति त्याग दो। तुम बुद्धत्व की खोज नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम तो दुख की खोज में लगे हुए हो। बुद्धत्व तो सिर्फ एक बहाना है।

जीवन से प्रेम करो, और अधिक खुश रहो। जब तुम एकदम प्रसन्न होते हो, संभावना तभी होती है, वरना नहीं। कारण यह है कि दुख तुम्हें बंद कर देता है, सुख तुम्हें खोलता है। क्या तुमने यही बात अपने जीवन में नहीं देखी? जब भी तुम दुखी होते हो, बंद हो जाते हो, एक कठोर आवरण तुम्हें घेर लेता है। तुम खुद की सुरक्षा करने लगते हो, तुम एक कवच-सा ओढ़ लेते हो। वजह यह है कि तुम जानते हो कि तुम्हें पहले से काफी तकलीफ है और अब तुम और चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते। दुखी लोग हमेशा कठोर हो जाते हैं। उनकी नरमी खत्म हो जाती है, वे चट्टानों जैसे हो जाते हैं।

एक प्रसन्न व्यक्ति तो एक फूल की तरह है। उसे ऐसा वरदान मिला हुआ है कि वह सारी दुनिया को आशीर्वाद दे सकता है। वह ऐसे वरदान से संपन्न है कि खुलने की जुर्रत कर सकता है। उसके लिए खुलने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी कुछ कितना अच्छा है, कितना मित्रतापूर्ण है। पूरी प्रकृति उसकी मित्र है। वह क्यों डरने लगा? वह खुल सकता है। वह इस अस्तित्व का आतिथेय बन सकता है। वही होता है वह क्षण जब दिव्यता तुममें प्रवेश करती है। केवल उसी क्षण में प्रकाश तुममें प्रवेश करता है, और तुम बुद्धत्व प्राप्त करते हो।

साभार: दि रिवोल्यूशन पुस्तक से
प्रस्तुति:अरुण साथी

03 अगस्त 2017

कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ

आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है

कविवर मैथलीशरण गुप्त को जयंती पे नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ

आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है

09 जुलाई 2017

गुरुदेव ओशो ने मुझे आदमी बनाया..

गुरुदेव ओशो ने मुझे आदमी बनाया...गुरु पूर्णिमा पे नमन #ओशो
(अरुण साथी)

किशोरावस्था में गुरुदेव #ओशो आशीर्वाद मुझे "मिट्टी का दीया" नामक पुस्तक के रूप में मिला। एक छोटी सी यह किताब मुझे कहीं कबाड़खाने में फेंकी हुई मिली थी। ठीक से याद नहीं। पढ़ने की आदत ने उसे मिला दिया। उस समय उसका कवर नहीं था तो शीर्षक नहीं होने से पता नहीं था कि यह मिट्टी का दिया है पर उस पुस्तक को पढ़ने के बाद जीवन में सोचने और जीने का तरीका ही बदल गया। बहुत दिनों बाद जाना कि वह ओशो की पुस्तक थी। बाद में ओशो को पढ़ते पढ़ते ओशो को कुछ कुछ जानने लगा, जीने लगा और गुरुदेव मानने लगा..

उस पुस्तक के कुछ अंश आज भी जेहन में जिंदा है। एक प्रसंग सुनाते हुए ओशो कहते हैं कि एक राजा को वित्त मंत्री की जरूरत थी और उसके लिए बड़े-बड़े गणितज्ञ पहुंचे। राजा ने सभी को एक कमरे में बंद कर दिया और कहा कि गणितीय जोड़-घटाव से जो दरवाजा खोलकर बाहर आएगा वही मेरा मंत्री बनेगा। सभी महान गणितज्ञ घंटों जोड़ घटाव करते रहे पर उन्ही में एक शांतचित्त बैठकर थोड़ी देर के बाद उठा और दरवाजा खोल कर बाहर चला गया। ओशो कहते हैं कि सबसे पहले सत्य को खोजो। सत्य है कि नहीं। यदि सत्य है तो वह मिलेगा। दरवाजा बंद नहीं था गणितज्ञों ने उसे खोजने का प्रयास नहीं किया। जीवन का मूल मंत्र ओशो ने वहां दिया। उसी प्रसंग में ओशो कहते हैं ईश्वर यदि सत्य है तो अवश्य मिलेगा और ईश्वर है, यह मैं भी कहता हूं। बस उसे खोजने की उत्कंठा होनी चाहिए। यदि सत्य है तो अवश्य मिलेगा। आगे पढ़ने की उत्कंठा हमेशा बनी रही और जीवन में बदलाव आते गए। प्रेम से लेकर जीवन जीने तक ओशो ने सब कुछ सिखाया। प्रेम में छल नहीं करना ओशो ने बताया। प्रेम को सबसे बड़ा धर्म ओशो ने बताया। धर्मों के प्रति कट्टरपन को ओशो ही दूर कर दिया।

ओशो कहते हैं कि यदि एक बच्चा हिंदू के घर में जन्म लें और मुसलमान के घर छोड़ दिया जाए और एक बच्चा मुसलमान के घर जन्म ले और हिंदू के घर छोड़ दिया जाए तब उसका धर्म क्या होगा? यह सोचिए तो धर्म के प्रति आपकी आस्था बदल जाएगी। वाकई यह सोचनीय बात है। किसी भी धर्म के बारे में आपको कौन बताता है। आपके माता पिता, मुल्ला, पंडित, पुरोहित यह थोपा गया धर्म है। यह धर्म आपने नहीं खोजा। धर्म एक सत्य है, शास्वत सत्य। पर उसे आप स्वयं ढूंढिए। महसूस कीजिए। वही धर्म सच्चा धर्म होगा। कई प्रसंग हैं पर जीवन को ओशो के मूल सिद्धांत के अनुसार हमेशा से मैंने छोड़ दिया है। नदी की धार की तरह बहते चलो। कहीं रुको मत। चलते चलो। रुक जाना तालाब बना देगा और तालाब का पानी सड़ जाता है, कीड़े लग जाते हैं। चलता चला जा रहा हूं सतत, अनवरत...

गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:।
गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:।।

13 जून 2017

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। उसके पीठ और सीने की हड्डी जाने कैसे, पर विचित्र तरीके से टेढ़ी मेढ़ी थी। असीम पीड़ा से जूझता एक आदमी। अष्टावक्र!

बहुत लोग उसे कुब्बड़ कहके चिढ़ाते थे। बस इसी बात पे उसे गुस्सा से जलजलाते देखा है, कई बार। और अंदर से घूँटते हुए भी...। मायूसी में कई बार कहता, "अल्लाह जाने कौन बात का सजा दिहिस है।"

सब कुछ के बाबजूद वह पढ़ाई करने में परिश्रमी था। किताबों से लगाव ही उसे मेरे करीब लगा। मेरे साथी बुक स्टॉल का कई सालों तक वही मालिक रहा। बिना किसी लोभ लाभ के।

आज अचानक उसकी याद आयी है। सुबह सुबह वह सपनों में आया। जाने कुछ कह रहा था। सुन न सका।

उससे जुड़ा एक प्रसंग है। पाक रमजान का ही महीना था और हम चार-पांच दोस्तों के साथ बाजार में टहल रहे थे।  तभी एक मित्र ने होटल के आगे उस को चिढ़ाते हुए कहा कि
"रसगुल्ला खाओगे मोनू!" वह जानता था कि मोनू रोजा में है और रसगुल्ला नहीं खायेगा!

मोनू ने भी तपाक से जवाब दिया!
"सभ्भे के भर पेट ख़िलइमहिं त खा लेबौ!"

सबको पता था कि मोनू रसगुल्ला नहीं खाएगा क्योंकि वह रोजा रखे हुए है। सभी लोग यह भी जानते थे कि जिस मित्र ने यह प्रस्ताव दिया है वह बेहद कंजूस है और वह रसगुल्ला नहीं खिलाएगा। दोनों तरफ से नकारात्मक स्थिति थी फिर भी हम दोस्तों को क्या, मजा लेने के लिए कंजूस मित्र को उकसा दिया।

"मख्खीचूस तेलिया कहाँ से रसगुल्ला खिला देतै, दम है!"

"चल सबके भर पेट खिला देबौ, मोनू खाईतो तब..।"

तब मोनू भी तैयार हो गया। सभी लोग होटल में बैठे तब तक किसी को विश्वास नहीं था कि मोनू रसगुल्ला खाएगा परंतु सभी के आगे रसगुल्ला रखा गया। हंसी-मजाक होती रही। सब ठहाके लगाते रहे। सबको पक्का विश्वास था कि कोई रसगुल्ला नहीं खाएगा क्योंकि मोनू नहीं खाने वाला है। मोनू ने सबसे पहले होटल के संचालक को एडवांस पैसा देने के लिए कहा क्योंकि उसे पता था कि वह भरपेट रसगुल्ला नहीं खिलाएगा। कंजूस बहुत है। खैर, इसी शर्त पर हहा-हिहहि चल रहा था और मोनू ने रसगुल्ला दबा दिया। हम सभी अवाक रह गए। फिर भी मित्रों का क्या, सब ने दबा, दबा कर रसगुल्ला दबा लिया। लंबा बिल बना। बेचारे मित्र का मुंह लटक गया। जब हम लोग खा पीकर निश्चिंत हो गए तब पूछने पर कि मोनू ऐसा क्यों किया? हम लोगों को तो उम्मीद नहीं थी। हम लोग तो मजाक कर रहे थे। कहीं गलती तो नहीं हो गई हम लोगों से। मोनू ने कहा कि

"ऐसन कोय बात नै। दोस्त के खुशी ही सबसे बड़का इबादत हई। एक दू दिन रोजा टूटे से खुदा नाराज नै होता। अउ दोस्त के खुशी से बढ़के कुछ नै होबो हैय। बाद में रोजा मेकअप करे के नियम हई।"

खैर, आर्थिक परिस्थिती ने मोनू के सारे परिवार को यहां से गया जाने पर विवश कर दिया। सभी लोग वही सेटल हो गए। कभी कभार मोनू आता, भेंट हो जाती। मिलकर भी और मोबाइल पर भी सूचित कर वह गया आने के लिए कई बार कहता पर जीवन की आपाधापी में कभी वहां नहीं जा सका। इसी बीच खबर आई कि नियोजन के माध्यम से वह शिक्षक हो गया। बाढ़ के आसपास किसी गांव में। एक दिन उसने सूचना दिया, वह शादी कर रहा है। मेरी खुशी का पारावार नहीं रहा। लगा कि ईश्वर दुख ही नहीं देते, कभी-कभी खुशी भी देते हैं। इसीलिए उनको परमपिता परमेश्वर कहा गया है। मैंने उससे कहा कि
"चल मोनू अब अल्लाह से शिकायत खत्म हो जयतौ। नयका जिनगी मुबारक।

उसने बारात में आने के लिए कहा। हम
तैयार भी हुए पर दुर्भाग्य ऐसा की बारात नहीं जा सका। जिस दिन बारात जानी थी उस दिन लगा जैसे ईश्वर अपनी नाराजगी को जाहिर करने लगे हो। इतनी मुसलाधार बारिश होने लगी, लगा कि हर जगह बादल फट पड़ेगा। धरती उसमें समा जाएगी। बादलों की गड़गड़ाहट से थर-थर धरती कांपने लगी हो। विचित्र सा माहौल था। मोबाइल पर मोनू को सूचित किया। उसने मजबूरी समझी और मायूस भी हुआ। निकाह के बाद उसने मोबाइल पर अपनी बीवी से बात भी कराया। बहुत खुशी हुई।

इसी तरह कभी-कभी मोनू से बातचीत करता रहता था। कुछ महीने बाद मैंने मोनू के मोबाइल पर कॉल किया। अचानक से उधर जिसने मोबाइल उठाई उसने मायूस होकर कहा कि मोनू का इंतकाल हो गया। शारीरिक लाचारी की वजह से उसके हृदय ने जवाब दे दी और वह चल बसा। एक मिनट के लिए सन्नाटा सा छा गया। लगा अल्लाह ने उसे थोड़ी सी खुशी बस इसलिए दी थी कि उसे ख़ुशी का एहसास हो जाए और फिर अलविदा कह कर चल दे...आह आह..

11 जून 2017

एक गोली मुझे भी मार दो...

एक गोली मुझे भी मार दो न..

(अरुण साथी, बरबीघा, बिहार)
हरिया। यही मेरा नाम है। किसान हूँ, अक्सर किसानों का यही नाम होता है । जब से सरकार ने गोली मारने के बाद एक करोड़ मुआवजा देने का ऐलान किया है तभी से सोच रहा हूं क्यों ना मैं भी मर ही जाऊं। परेशानी यह है कि गोली सरकारी होगी तभी तो एक करोड़ का मुआवजा मिलेगा क्योंकि आत्महत्या करने के बाद कर्ज माफी तक नहीं होती।

खैर, कोशिश करके देखता हूं। हां, इसके लिए कुछ आवश्यक चीजें जरूरी है। जैसे कि किसी विपक्ष के नेता का सहयोग और समर्थन, जो कुछ लोगों को जुटाकर उग्रता कराए और इसी बीच पुलिस गोली चला दे जिसमें मैं मारा जाऊं या फिर मीडिया का समर्थन जो मेरे दर्द को दिखाएं कम, चिल्लाये ज्यादा और पूरे देश में हाय तौबा मच जाए। क्योंकि मरता तो मैं रोज ही हूं पर तब हंगामा नहीं मचता। बिपक्षी नेता और सपक्षी मीडिया खामोश रहती है। सौ रुपये का अनाज उपजा कर अस्सी में बेचना मरने से कम है क्या? पानी, दवा के लिए तिल तिल कर मरना, मरने से कम है क्या? पर एक पैसे का मुआवजा कहां कभी मिलता है। और सोशल मीडिया की तो पूछो मत साहब। शास्त्रों, पुराणों में जिस स्वर्ग की बात कही गयी है वह यही तो है। एक से एक संत महात्मा, छोड़िये। भटके हुए के साथ फालतू में भटकना कैसा।

इसी बीच कभी कभी सोचता हूं कि एक सरकारी गोली खाकर मर भी जाऊं तो एक करोड़ कितना होता है मुझे कहां पता! तीन जीरो या चार जीरो से अधिक पैसे नहीं देखे है इसलिए कितना होगा क्या पता! शायद दो तीन बक्से में आ जाए। अरे, उसे रखूंगा कहाँ! यही परेशानी हो जाएगी। फिर अचानक यह भी सोचने लगा, चलो मान लिया कि सरकार की गोली लगी, तुरंत मर गया तो एक करोड़ मिल जाएगा। बाल-बच्चों के जीवन बन जाएंगे। शायद एक करोड़ में दो-तीन पीढ़ी आराम से काट ले पर इतने पैसे मिलने के बाद मेरे बच्चे किसान भी तो नहीं रहेंगे! वह खेती छोड़ देंगे! अनाज उपजायेगा कौन? लोगों को खिलाएगा कौन? अरे किसान रहकर तिल तिल क्यों मरना। बात खत्म करो। एक बार सरकारी गोली से मारो। सात पुस्तों को धनवान करो। चिंता छोड़ो, सुख से जिओ।

अरे सुना है सरकार हमारी मौत पे एक दिन का उपवास भी करेगी। आह! सुखद! सौभाग्य! यहां तो सालों उपवास करता हूँ तो कोई पूछता नहीं।

अच्छा, ऐसा हो सकता है, क्यों नहीं, हां क्यों नहीं होगा। सरकारी गोली खाओ आंदोलन पूरे देश में चले। हम सब किसान सरकार से कहें कि हमें गोली मार दो। गोली मारने के बाद एक करोड़ का मुआवजा तो मिल ही जाएगा! हाड़ तोड़ मेहनत, खून पसीना बहाकर, खेतों में हल चलाकर, मजदूरी करके हजार नहीं जुटा पाते तो एक गोली खाकर करोड़ों मिले तो
कौन नहीं मरना चाहेगा...चलो, चलो हमसब मरते है...हम सब किसान सरकारी गोली खाकर मरने के लिए तैयार है...आप मुआवजा देने के लिए तैयार रहो, सरकार बहादुर...एक गोली मुझे भी मार दो...



07 जून 2017

किसान हो, औकात में रहे..

किसान हो, औकात में रहो
देखते नहीं हो
तुम्हारी सरकार
तुम्हारे लिए कितना
कुछ कर रही है

योजनायों का पहाड़ है
फसल बीमा से लेकर
तुम्हारी आत्महत्या के लिए

बड़ी बड़ी कंपनियों का
बीज है
उर्वरक है
प्रचार पे अरबों खर्च है
भाषण है
मन की बात है
और क्या चाहिए..

तुम अन्न उपजाते हो
पराक्रम दिखाते हो
आधी रोटी खा सो जाते हो

फिर क्यों रोटी के लिए
सड़क पे आते हो
क्यों सरकार बहादुर के आगे
रोटी रोटी चिल्लाते हो..

आओ, फाइलों में देखो
और
सरकारी
योजनाओं का लाभ
उठाओ,

आत्महत्या कर आओ
एक लाख लेकर जाओ
या
प्रदर्शन में
सरकार की गोली खाकर
मारे जाओ
दस लाख नकद पाओ

बिकल्प तुम चुनो..
किसान हो
यथार्थवादी बनो
सपने मत बुनो
भगवान मत बनो

किसान हो, औकात में रहे...


15 मई 2017

एचएम और शिक्षक सरकारी स्कूल में पी रहे थे ताड़ी, शिक्षक ने मिलाया जहर

सरकारी स्कूल में नशीला पदार्थ आया ताड़ी, शिक्षक ने मिलाया जहर

शेखपुरा

बिहार में शिक्षा व्यवस्था का हाल बदहाल है। सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक ने नशीला पदार्थ ताड़ी मंगाई और शिक्षक के साथ मिलकर पीने लगे। जबकि एमडीएम छीने जाने से शिक्षक नाराज थे और चुपके से प्रधानाध्यापक के गिलास में जहर मिला दिया। हालांकि जहर मिलाते हुए रसोईया ने देख लिया और हल्ला हो गया जिससे प्रधानाध्यापक की जान बची। इस मुद्दे को लेकर आज ग्रामीणों ने काफी हंगामा किया। पहले अफवाह फैला दी गई कि एमडीएम में ज़हर मिलाया पर जांच में सारी सच्चाई सामने आ गई। एमडीएम की मोटी कमाई जानलेवा है। यह कभी बच्चों की जान लेता है तो कभी प्रधानाध्यापक का जान लेना चाहता है। यह हाल है शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड के काशीविघा मध्य विद्यालय का। होना तो कुछ है नहीं, जांच होगी और नीता पोती कर दी जाएगी!!! इति श्री..

14 मई 2017

विष्णु धाम तालाब खुदाई के दौरान निकली माता लक्ष्मी की प्रतिमा देखने के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ पाल कालीन प्रतिमा होने का अनुमान भगवान विष्णु की प्रतिमा भी तालाब के खुदाई में निकली थी

विष्णु धाम तालाब खुदाई के दौरान निकली माता लक्ष्मी की प्रतिमा

देखने के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

पाल कालीन प्रतिमा होने का अनुमान

भगवान विष्णु की प्रतिमा भी तालाब के खुदाई में निकली थी

बरबीघा (शेखपुरा)

शेखपुरा जिले के बरबीघा सामस विष्णु धाम मंदिर परिसर तालाब की खुदाई के दौरान शनिवार को माता लक्ष्मी की प्रतिमा निकली है। यह प्रतिमा भगवान विष्णु के मंदिर  के दौरान होने वाले तालाब की खुदाई के में निकली है।

विष्‍णुधाम सामस, क्या है खास।

शेखपुरा बिहार के शेखपुरा जिले में बरबीघा- वारसलीगंज सड़क पे बरबीघा से 5 किमी दक्षिण की ओर बिहार शरीफ से 25 किमी दूर सामस गांव स्थित विष्‍णुधाम मंदिर प्रसिद्व धार्मिक स्‍थल है। मंदिर में भगवान विष्‍णु की 7.5 फीट ऊंची व 3.5 फीट भव्‍य मूर्ति स्‍थापित है। विष्‍णु भगवान की यह मूर्ति स्‍वरूप में है और चार हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्मम स्थित है।
मूर्ति की वेदी पर प्राचीन देवनागरी में अभिलेख 'ऊं उत्‍कीर्ण सूत्रधारसितदेव:' उत्‍कीर्ण है। इस लिपि में आकार, इकार और ईकार की मात्रा विकसित हो गई है। ब्राह्मी लिपि में छोटी खड़ी लकीर के स्‍थान पर यह पूरी लकीर बन गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार की लिपि उत्‍तर भारत में नौवीं सदी के बाद मिलती है। प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (891-907 ई.) के दिघवा-दुली दानपात्र में इस शैली की लिपि का प्रयोग पुराने समय में किया जाता था। इस अभिलेख में मूर्तिकार 'सितदेव' का नाम भी लिखा हुआ है।
विष्‍णुमूर्ति के दांए व बांए दो और छोटी मूर्तियां हैं। यह स्‍पष्‍ट रूप से पता नहीं चल पाया है‍ कि ये मूर्तियां शिव-पार्वती की हैं या शेषनाग और उनकी पत्‍नी हैं। यह दुर्लभ मूर्ति 5 जुलाई 1992 में तालाब में खुदाई के दौरान मि‍ली थी। सामस गांव व उसके पास गांवों में खुदाई के दौरान बड़ी संख्‍या में मूर्तियां मिलीं। इनमें से कई सामस गांव के जगदंबा मंदिर में ही रखी गई हैं।

ढाई फीट ऊंची है लक्ष्मी की प्रतिमा

सामस विष्णु धाम मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉक्टर कृष्ण मुरारी सिंह तथा सचिव अरविंद मानव ने बताया कि खुदाई के दौरान निकली प्रतिमा लगभग ढाई फीट ऊंची और चतुर्भुजी प्रतिमा है। साथ ही साथ यह प्रतिमा भी भगवान विष्णु की प्रतिमा की तरह ही स्थानिक मुद्रा में है जिसकी वजह से इसे माता लक्ष्मी की प्रतिमा कहा  जा रहा है। हालांकि प्रतिमा खंडित अवस्था में है।

माता लक्ष्मी की एक प्रतिमा पूर्व में हो चुकी है चोरी

मंदिर समिति के सचिव सह ग्रामीण कवि अरविंद मानव की माने तो 50 साल पहले तालाव में भगवान विष्णु और लक्ष्मी की प्रतिमा गांव वाले देखते थे। इसी दौरान लक्ष्मी की प्रतिमा चोरी कर ली गई और बाद में फिर खुदाई कर भगवान विष्णु की प्रतिमा निकाली गई।

सामस गढ़ में है कई पौराणिक प्रतिमा

सामस में खुदाई के दौरान गांव में कई प्रतिमा निकली है। गांव के जगदंबा स्थान में ऐसे ही कितनी प्रतिमाएं रखी हुई है जिसकी पूजा ग्रामीण करते हैं। जगदंबा स्थान में माता जगदंबा की एक प्राचीन प्रतिमा को लोग कुल देवी के रूप में भी पूजा अर्चना करते हैं।

खुदाई हो तो उजागर होंगे रहस्य

सामस गढ को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर ग्रामीण देखते हैं। ग्रामीणों की अगर मानें तो यहां राजा का किला होने तथा उनके द्वारा मंदिर निर्माण की बात ग्रामीण कहते हैं। जबकि मुगलों के आक्रमण के दौरान इन प्रतिमाओं को खंडित कर तलाव में फेंक दिए जाने की बात भी ग्रामीण कह रहे हैं। ग्रामीणों की अगर मानें तो सरकारी स्तर पर इस गढ़ की खुदाई किए जाने पर यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े कई रहस्यों का पता हो सकता है।

ओशो के विचार: सुखी रहने के सफल मंत्र

ओशो के विचार, सुखी रहने का सफल मंत्र ** दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दअसल, तुम जिस पर ध्यान देते हो...